You are currently viewing Learnings From Bhagavad Gita

Learnings From Bhagavad Gita

जय श्री कृष्ण 🙏 मैं अपना कर्म आरंभ करता हूँ

Note: This post will be regularly updated, keep coming back for absorbing the eternal knowledge of Bhagavad Gita

भागवद गीता को दुनिया का सबसे महानतम ग्रंथ मना जाता है, इस दुनिया में शायद ही कोई ऐसा धर्म ग्रंथ होगा जिसके बारे में इतना लिखा गया होगा।

भागवद गीता वर्तमान के समय मे एक मार्गदर्शक की तरह है जो भटके हुए राही को सही राह दिखता है।

चाहे आप दुनिए के किसी भी संकट, दुविधा या परेशानी में क्यों न फंसे हो, भागवद गीता आपको सही राह दिखाएगा। दुनिया के हर प्रश्न, दुविधा का उत्तर भागवद गीता में है – मुझे आज्ञा दीजिये की में आप तक भागवद गीता के अपार ज्ञान को आप तक पहुंचा सकूँ।

जय श्री कृष्ण 🙏

अध्याय 1 – अर्जुनविषादयोग

पहला अध्याय शुरू होती है धृतराष्ट्र के सवालों से, वे जानना चाहते हैं कि दुर्योधन की सेना क्या कर रही है और पाण्डु पुत्रों की सेना क्या कर रही है, उसके बाद आता है दोनों सेना के शूरवीरों का वर्णन, उसके बाद अर्जुन का विषाद

  1. Always do the right thing, no matter what.. Whenever we are doing something wrong, we know in our minds that we are doing wrong
  2. Always analyse your Competitors, problems, and compare yourself to your Competitors. We should know each and every part of our problem. We should always know each and everything about our problems.
  3. We also have to know all the strong points and weak points of ourselves, SWOT analysis
  4. We should always study each and everything about our problem, to combat that effectively because surprise can make us lose war.
  5. Apki Hunar, himmmat, mehnat,sanghi, rishtedar humare liye hamesha khade rahenge
  6. घमंड कभी न करें – ये हारने की शुरुवात है, कभी शत्रु को underestimate न करें
  7. Agar yuddh ka faisla le liya jaye ya yuddh start ho jaye toh uske baad peeche nahi hatna chahiye
  8. Protect the most important thing in your war, until you win.
  9. युद्ध जीतने के लिए माहौल बनाना पड़ता है, वैसे ही वातावरण बनाने पड़ता है, apne aap ko motivate karte rehna chahiye
  10. हर युद्ध, हर चुनौती नए challenges लेके आती हैं, उनके हिसाब से हमे तैयार रहना चाहिए
  11. हमे हमेशा, har din अपने आप को motivate करते रहना चाहिए
  12. Do whatever that motivates you and get ready for a war.
  13. Motivation सबको चाहिए युद्ध जीतने के लिए
  14. सच्चा योद्धा हर चुनौती के लिए तैयार रहता है aur waqt aane pe un chunautiyon se ladhta bhi hai
  15. आपकी प्रतिभा ऐसा होनी चाहिए कि सामने वाला आपकी कौशल से प्रभावित हो जाये, first impression best दीजिये, युद्ध से पेहोए अपने शत्रु को दहाड़ से दराइये, ये हुंकार ऐसी होने चाहिए के शत्रु सोचे कि ये में किस्से युद्ध करने जा रहा हु
  16. जिसके साथ धर्म होता है वो कभी हार नहीं सकता isiliye Arjun ne Shri Krishna ko chuna
  17. जब तक आप अपने समस्या के बीच मे नही जाएंगे tab तक आप अपनी समस्या को पूरी तरह नहीं समझ पाएंगे, apni samasya ko poori tarah samajhne ke बाद निर्णय लेना चाहिए
  18. युद्ध तभी करना चाहिए जब आप अपने शत्रु को अच्छे से जान परख लें
  19. युद्ध की बात करना आसान होता है, aur युद्ध करना मुश्किल – pariksha ke waqt bhi aisi hi ghabrahat hoti hai
  20. जब युद्ध मे पता नही हो कि क्या करना है, तब आप कुछ नही कर सकते – iss samay hume ek marg darshak ki zarurat hoti hai
  21. युद्ध से पहले अगर आपको लगता है कि आप हारने वाले है, आप कापते हैं तब आपको एक mentor की ज़रूरत होती है
  22. Yuddh ke samay aisi bohot si chizen hoti hain jo hamare man ko kamzor karti hain… aur yuddh karne se rokti hain… inhi lakshanon ko hume bhi pehchana hai
  23. जीवन में कई ऐसी घड़ी आती है जहां हमे अपनी सबसे प्रिये चीज़ को त्यागना पड़ता है, अपने goals को achieve करने के लिए
  24. लालच बुरी चीज है
  25. युद्ध से हट गए तब ये आपकी हार मानी जायेगी
  26. जहां परिवार की सम्मान नहीं, वहां किसी का सम्मान नहीं होता – kul ka naash ho jata hai – paap bhi bohot fail jaata hai
  27. परिवार की भलाई उसकी स्त्रियों की निर्भर करती है, agar koi ghar banta hai toh mahila se hi banta hai, जिस घर मे महिला नहीं उस घर का भविष्य नही होता, पाप के बढ़ने से स्त्रियों दूषित हो जाती है, और स्त्रियां दूषित होने से सब खत्म हो जाते हैं
  28. संसार की नियम बड़े सोच समझ के banaye jaate hain इसीलिए purane niyam ko कभी नही तोड़ना चाहिए
  29. वर्णसंकर से जाती, धर्म, समाज का नाश हो जाता है
  30. Galat warno se, galat tarike se santan ki jab utpatti hoti hai tab wo sab kuch khatam kar deta hai
  31. वर्णसंकर corrupt women से उत्पन्न होता है – aur jaati, dharm, kul naash ho jata hai
  32. हमेशा धर्म को मानें, धर्म का पालन करें
  33. Kul ka naam roshan karna purane samay me bohot badi baat mani jaati thi.
  34. Jahan dharm nahi hota wo jagah apne aap hi nark ban jaati hai – aaj ke yug me bhi apko aisi jagah dikh jayengi
  35. Arjun sat down being sad, after seeing their relatives in the battlefield

अध्याय 2 – संख्ययोग

इस अध्याय में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन की दुविधा का उत्तर देंगे, यहां से शुरुवात होती है उस ज्ञान की जिसके लिए भागवद गीता दुनिया का सबसे महानतम ग्रंथ और ज्ञान का भंडार मन जाता है।

  1. शत्रु से मोह दिखाना सच्चे योद्धा की निशानी नहीं – अपने कर्म से मुह मोड़ कर बैठना ठीक नहीं – इससे कभी कोई लाभ नहीं होता
  2. मन की दुर्बलता छोड़ हमें सिर्फ उस कर्म के बारे में सोचना चाहिए जो हम करने के लिए आये हैं
  3. दुनिया में कई ऐसे लोग हैं जो सोचते हैं कि परिवार भी न छुटे और मोक्ष भी प्राप्त हो जाये, लेकिन तोह संभव नहीं – कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है
  4. कमज़ोर क्षणों में हम डर जाते हैं जिससे confusion का भाव आता है – इस समय हमें एक mentor की ज़रूरत होती है, गुरु से कुछ छुपाना नही चाहिए तभी वो आपकी मदद कर पायेंगे
  5. जब अपनों का दुख सताता है तोह किसी भी तरह का लाभ सुख नहीं देता, अगर आप शोक में हैं, दुख में हैं, तोह जबतक आप उसका उपाय ढूंढ नहीं लेंगे तबतक दुनिया का कोई भी और सुख आपको सुख नहीं देगा
  6. किस समय कौनसी दुर्बलता हमपे हावी हो जाये ये हमें मालूम नहीं, इसीलिए हमेशा अपना 100℅ देने का कोशिश करें, और जब अर्जुन के ऊपर दुर्बलता हावी हुई थी तोह अर्जुन उस दुर्बलता को जीत के आगे बढा था और उसी तरह हमें भी आगे बढ़ना होगा

भगवान श्री कृष्ण का गीत ज्ञान यहां से आरंभ हो रहा है 👇

आत्मा

  1. यहजो पंडित और ज्ञानी होते हैं वो किसी के जीवित रहने पर या जीवित न रहने पर शोक नहीं करते – अर्थात इससे दुनिया में किसी भी बात का शोक नहीं करना चाहिए
  2. काल का खेल चलता ही रहता है, हर काल में, आने वाले time में भी हमारे जैसे, अर्जुन के जैसे और भगवान श्री कृष्ण के जैसे लोग रहेंगे, और ऐसा ही खेल फिर से होगा
  3. हमारी आत्मा वही रहती है लेकिन शरीर बचपन से बुढापे तक बदलता है, फिर नया शरीर मिलता है नए जन्म होने पर – बदलाव प्रकृति का नियम है – जो नहीं बदलता वो है आत्मा
  4. जिन्हें हमारी इन्द्रियाँ महसूस करती हैं, वो सर्दी, गर्मी, सुख, दुख तोह आते जाते रहते हैं – हमेशा नहीं रहते, भूख, प्यास, सर्दी गर्मी तोह खत्म होगी, लेकिन जो खत्म नही होगी उसे कहते हैं आत्मा
  5. सुख दुख जो बराबर समझे, दोनो हालात में एक जैसा रहे चाहे वो सुख या दुख बोहोत बाद ही क्यों न हो वही जीवन में आगे बढ़ता है, इन्द्रिय जिसको व्याकुल नहीं करते वो मोक्ष के योग्य होता है, सुख दुख तोह आते जाते रहते हैं – एक ही भाव कभी रुक के नहीं रहता
  6. जो झूठ है उसका कोई value नहीं है, value सिर्फ सच का है, समझदार लोग इस बात को समझते हैं, जिसका आना जाना लगा रहे उसके लिए कोई क्या शोक करे, सुख जाता है तोह दुख आता है, और फिर सुख आता है, इन दोनों का आना जाना लगा रहता है, इसी लिए ये दोनों भाव झूठे हैं, इनका कोई value नहीं है, value है तोह सिर्फ आत्मा का जो निरंतर है और सिर्फ वही सच है
  7. सिर्फ आत्मा ही हमेशा के लिए है, बाकी सब कुछ आता जाता रहता है, और यही सबसे बड़ा सच है
  8. भगवान श्री कृष्ण कहते हैं अर्जुन से , तू युद्ध कर, अपना कर्म कर क्योंकि शरीर नाशवान है और आत्मा अमर है, और वही सच्चाई है तोह शोक किस बात का करना
  9. जो आत्मा को मरने वाला समझते हैं वे सच्चाई को नहीं जानते, क्योंकि आत्मा न तोह किसीको मरती है और ना ही किसी के द्वारा मारी जा सकती है, अर्थात आत्मा का होना ही सच है, जो लोग सोचते हैं कि वो लोग बोहोत कुछ कर देंगे ये सिर्फ उनकी नादानी है, अज्ञानता है
  10. आत्मा ना तोह किसी काल में जन्मती है ना तोह किसी काल में मारी जाती है, आत्मा हमेशा रहती है, बाकी सब कुछ आता जाता रहता है, आत्मा को छोड़ कर सब कुछ आएगा और जाएगा
  11. जो पुरुष इस आत्मा को अजन्मा मानता है वो कैसे किसीको मरवा सकता है, जो इस बात को समझता है कि आत्मा ही सबसे बड़ा सच है वो किसी को कैसे मार सकता है , इस बात को समझने का मतलब है ब्रम्ह रूपी सच को समझना, महत्व हमें देना है अपनी आत्मा को जो हमेशा थी और हमेशा रहेगी, नाशवान शरीर को नहीं
  12. जैसे नानुष्य पुराने वस्त्र त्याग कर नए वस्त्र ग्रहण करता है उसी तरह आत्मा भी शरीर बदलता है, एकदम वैसे ही जैसे हम कपड़े बदलते हैं, शरीर की आयु होती है परंतु आत्मा की नहीं
  13. इस आत्मा को शास्त्र नहीं काट सकते, आग नहीं जला सकता, इसको जल नहीं गाला सकता, और वायु सूखा नहीं सकती, आत्मा हमसे पहले भी थी और आगे भी रहेगी
  14. आत्मा स्थिर है, सनातन है और हमेशा रहेगा, हमे आत्मा को समझना होगा तभी हमें मुक्ति मिलनी संभव हौ वार्ना मोह हर माया की इस दुविधा में हम हमेशा फंसे रह जाएंगे, जैसे कि अभी अर्जुन फंसा हुआ है ओपन कर्म करने को तैयार ही नहीं
  15. आत्मा का स्वरूप अव्यक्त है क्योंकि इस आत्मा को हम इन्द्रियों से नहीं समझ सकते, इसको आप सोच भी नहीं सकते, इन्द्रियों की मदद से हम सुख, दुख, सर्दी, गर्मी महसूस करते हैं
  16. आत्मा का ये ज्ञान श्री कृष्ण अर्जुन को इसीलिए दे रहे हैं क्योंकि जिनके लिए वो शोक कर रहा है वो व्यर्थ है, अगर अर्जुन आत्मा को जन्म लेने वाला या मारने वाला मानता है तोह भी युद्ध में मारने वाले के लिए शोक करके कोई मतलब नहीं
  17. श्री कृष्ण कहते हैं के हे अर्जुन अगर तुम मानते हो कि जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है, और मेरे हुए का जन्म निश्चित है तोह इससे भी तुम्हे इस बिना उपाय वाले विषय मे शोक करने का कोई हक नहीं है – कई बार हैम उन बातों के लिए शोक करते हैं जिनका होना तय है, ये समझदारी नहीं है, जो तय है वो होगा ही, और जो होगा ही तोह उसके लिए शोक करके अपने आप को कमज़ोर या दुर्बल बनाने की क्या आवश्यकता है
  18. हे अर्जुन सम्पूर्ण प्राणी जन्म के पहले अप्रकट थे, और मृत्यु के बाद भी अप्रकट हो जाएंगे, केवल बीच में ही प्रकट है फिर ऐसी स्तिथि में शोक क्या करना, जो आता है वो जाता भी है फिर ऐसी स्तिथि मे शोक क्या करना
  19. कुछ लोग ज्ञान की बातें सुनते हैं, लेकिन कुछ देर बाद वापस अपनी मोह माया की दुनिया में लग जाते हैं, इसी मोह माया से तोह निकलना है अगर आप आत्मा को समझना चाहते हैं
  20. हे अर्जुन ये आत्मा सदा ही सबके शरीर में अवध्य है, इस करण तू समपूर्ण प्राणियों के लिए शोक करने योग्य नहीं है, आत्मा को समझना ही मोक्ष की प्राप्ति है

कर्म

  1. तुझे भय नहीं करना चाहिए क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्म युक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है
  2. अगर हमने किसी काम को करने का निर्णय ले लिया है तोह फिर उस काम से डरना नहीं चाहिए, पूरे तन और मन से उस काम में लग जाना चाहिए
  3. निर्णय के बाद डरने का कोई मतलब नहीं, सिर्फ करने का मतलब है, कर्म करने का
  4. भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही युद्ध, challanges को पाते हैं
  5. युद्ध को, challenge को खुले मन से स्वीकार करने में ही सबसे बड़ी खुशी है, युद्ध, चुनौती, challenges स्वर्ग का खुला हुआ द्वार है
  6. हमको भी अगर अपने जीवन में चुनौती मिलती है, तो उसे मोक्ष मानकर उस challenge को पूरा कर जाने में लग जाना चाहिए
  7. किन्तु यदि तू इस धर्म युक्त युद्ध को नहीं करेगा तोह स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा – अगर हम challange को, युद्ध को, चुनौती को स्वीकार नहीं करेंगे तोह पाप को प्राप्त होंगे
  8. युद्ध करने से अगर मना कर दिया तोह उससे बड़ा अपमान उससे बड़ी बेज़्ज़ती कुछ नहीं हो सकती, कुछ लॉकन की भीड़ में अगर आप जाते हैं तोह लोग आपको सम्मान से देखते हैं, आपकी प्रशंसा करते हैं, और दूसरी स्तिथि में अगर आप कहीं जाते हैं तोह लोग अपमान से देखते हैं, पनई नज़रें फेर लेते हैं – आपको क्या स्वीकार है? अपमान या सम्मान, युद्ध को छोड़ देने का मतलब ही अपमान है
  9. जिनकी दृष्टि में पहले तुम शूरवीर कहलाते थे, दूसरे से ऊपर का दर्जा तुमको जो देते थे, वे महारथी अब तुमको भय के कारण युद्ध से हटा हुआ मानेंगे, युद्ध से हट जाने से लोग आपको कायर मानेंगे, और बोहोत अपमान भी होता है, युद्ध में हिस्सा लेना भी एक बोहोत बड़ी बात होती है, और युद्ध में कौशल दिखाना भी, कोई अगर युद्ध से ही मुह फेर ले तोह समाज में उसे कोई जगह नही मिलती
  10. हमारे शत्रु तोह इसी ताक में रहते हैं कि कब हमारी बुराई कर सकें, उन्हें ऐसा मौका क्यों देना – युद्ध से भाग के उन्हें ऐसा मौका क्यों देना? वे इसी ताक में रहते हैं कि कैसे आपको नीचा दिखाया जाए
  11. पूरे जी जान से खेलने पर आप हार जीत की चिंता नहीं करते, क्योंकि आप अपना सब कुछ झोंक चुके होते हैं, जीतने पर नाम होता है, और हारने पर भी आप अपने और दूसरों के मन में सम्मान पाते हैं, क्योंकि आपने धर्म के अनुसार युद्ध किया, इसीलिए अपनी चुनौतियों से कभी भी मुह नहीं मोड़ना चाहिए
  12. जय पराजय लाभ हानि सुख दुख को समान समझ कर युद्ध के लिए तैयार हो जा, युद्ध करने से हे अर्जुन तू पाप को नहीं प्राप्त होगा, अगर आप युद्ध में अपना सब कुछ झोंक भी देंगे तोह अगर आप हर भी जाते हैं तोह तोको दुख नहीं होगा क्योंकि आपने अपना 100% दिया

ऊपर की बातें अर्जुन के लिए ज्ञान योग के वविषय में कही गयीं हैं अब आप इसे कर्मयोग के विषय में सुनो

ज्ञान सोचने और समझने की बात है और कर्म, व्यवहारिक practical काम करने का , दोनो तरीके हैं अपने गंतव्य, मंज़िल या destination तक पहुंचने का

  1. सबके लिए ज्ञान का , साधना का, साधुओं का मार्ग संभव नहीं है, हमारे जैसे ज़्यादातर लोगों को कर्मयोग अपनाना चाहिए, अगर कर्मयोग को समझ कर हम उसपर चल सकें तोह कभी निराश नहीं होगी, अगर हम इस कर्मयोग को थोड़ा सा भी समझ लें तोह जन्म और मृत्यु के डर से हमेशा के लिए बच सकते हैं
  2. कर्मयोग में जब फैसला लेना हो तोह बुद्धि एक ही होती है, लेकिन जहां सोच की, निर्णय की, फैसले की कमी हो वहां कई बुद्धियाँ काम करती हैं और इंसान को भ्रमित, confuse कर देती हैं। जब आप कोई निर्णय, फैसला नहीं ले पाते तोह बोहोत सी दिशाओं में आपकी बुद्धियाँ जाती है, लेकिन जब आप निर्णय करने की सोच लें तोह फिर उसके बाद सिर्फ उस काम को करने का ही प्रण होता है और ऐसा ही होना चाहिए
  3. जो लोग सिर्फ कर्म के फल, लाभमें इच्छा रखते हैं, ऐसे लोग कर्म फल का प्रशंसक होते हैं, जब भी कोई काम उससे होने वाले फायदे से शुरू होता है तोह वो कर्म, काम नहीं स्वार्थ हो जाता है – आप अकर्मी होने से बचें
  4. कर्मफल के प्रशंसक ढोंगी लोग होते हैं – ऐसे ढोंगी लोगों से बचना चाहिए
  5. जो कर्म की बातें सिर्फ भोग और ऐश्वर्य के लिए करते हैं, उन लोगों की परमात्मा में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती, ऐसे लोगों का धेय या लक्ष्य सिर्फ स्वार्थ होता है, फायदा होता है, भगवान या अपने काम में सच्ची लगन नहीं होती, ऐसे लोगों की संगत से बचना चाहिए – इनकी पहचान होती है इनके negative रवैये से, काम में इनकी कोई रुचि नहीं होती, बस उस काम का फल भोगने में इनको बोहोत रुचि होती है
  6. वेद भी सिर्फ 3 गुणों में सीमित हो जाते हैं, उसके आगे है कर्मयोग, भगवान श्री कृष्ण का कहना है कि कर्म करो लेकिन उसके फल से लगाव न रखो
  7. बेहद बड़े जलाशय प्राप्त हो जाने पर, छोटे जलाशय में मनुष्य का जितना प्रयोजन रहता है, उसी तरह से जिसने ब्रम्ह तत्व को समझ लिया उसके लिए वेदों की कोई आवश्यकता नहीं
  8. कर्मयोग तोह उस बड़े तालाब की तरह है जो एक बार आपको मिल गया तोह फिर आपको छोटे तालाब की आवश्यकता क्यों रहेगी, कर्मयोग का खेल इतना बड़ा है कि उसके आगे सारे ज्ञान छोटे पड़ जाते हैं – लेकिन कर्म को समझना पड़ेगा कि आखिर ये होता क्या है
  9. तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं, इसलिए तू कर्मों के फल के लिए काम मत कर, और ऐसा भी न हो कि तू कर्म ही ना करे, कर्म करना है लेकिन फल के लिए नहीं, उसे अपना धर्म और अपना कर्तव्य समझ कर – गीता के सबसे लोकप्रिय श्लोक में इस श्लोक की गिनती होती है
  10. कर्म के फल की इच्छा मत कर, और ऐसा भी न हो कि तू कर्म ही ना करे, यही निष्काम कर्म की कुंजी, उसकी चाबी, उसका सार है, कर्म के बाद क्या फल मिलेगा इसकी परवाह किये बिना बस पूरी लगन से अपने धर्म और कर्तव्य को पूरा कर
  11. फल की इच्छा को छोड़ के जो निष्काम कर्म योगी होता है वो पाप पुण्य से दूर हो जाता है, जो फल के लिए काम करते हैं उन्हें हमेशा असफल होने का डर रहता है और इसीलिए कभी भी वो कर्म को अच्छे से नहीं कर पाते और फिर उनको फल मिल भी जाता है तोह इसी फल में उलझ जाते हैं, इसीलिए हमें बुद्धि योग की शरण में आना चाहिए, लगन सिर्फ काम में और भगवान में टैब बुद्धि निश्चय से काम कर पाती है
  12. बुद्धि योग के शरण में आने से बिना फल के काम करने वाला इसी दुनिया में पाप पुण्य से मुक्त हो जाता है – अच्छा हो बुरा हो सुख हो या दुख हो , सभी में एक ही तरीके से, समभाव से तू बस अपना कर्म , अपना कर्तव्य करता रह
  13. आम इंसान कर्म करके उसके फल को प्राप्त कर खुश होता है, और उसके बाद दूसरे फल की लालच में फिर से नए कर्म में लग जाता है, इसमे फल के बारे में सोचना ही प्रधान है और यही गलत बात है, अगर आप अपनी सारी शक्ति, क्षमता, और इच्छा सिर्फ कर्म में लगाएं और फल को भूल जाएं तोह आपके ध्यान कर्म में होगा, आप उस कर्म में बेहतर होंगे, आपकी तरक्की होगी और रही बात फल की टोह सोच के देखिये, अगर आपने कर्म किया है तोह फल जाएगा कहां
  14. कर्म के फल का मोह हो या रिश्तों का मोह या ऐश्वर्या का मोह, यही मोह हमें फंसता है, जब बुद्धि मोह के दलदल से निकल जाती है, तब परमात्मा के पास आने की राह निकल आती है। रिश्ते, धन, ऐश्वर्या बुरे नहीं , उनसे मोह बुरा है, क्योंकि जब आपका लगाव इन वस्तुओं से हो जाती है तब सोचने समझने की शक्ति कम हो जाती है, बुद्धि ठीक से काम नहीं करती, फैसले गलत हो जाते हैं, इसीलिए मोह को बुरा बताया गया है, ध्रितराष्ट्र के पुत्र मोह से ही पूरा महाभारत हुआ था, युधिष्टिर के जुए की मोह में उनका पूरा राज्य चला गया था

स्थिर बुद्धि

  1. जितने लोग होते हैं उतने किस्म की बातें होती हैं, और जितनी बातें होती हैं उतने तरीकों से बुद्धि सोचती है, जब दिमाग, बुद्धि, स्थिर होकर परमात्मा में लग जाती हैं तब उसे ही योग कहते हैं, बुद्धि का स्थिर हो जाना ही एकग्रतायानी concentration कहलाता है, स्थिर होकर एकाग्रता से कुछ करने को समाधि की स्तिथि भी कहते हैं, और अगर आपने समाधि की स्तिथि से कुछ काम किया हो तोह वो काम कभी भी व्यर्थ नहीं होगा
  2. अर्जुन पूछते हैं भगवान श्री कृष्ण से की हे केशव , समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त हुए स्थिर बुद्धू पुरुष के क्या लक्षण हैं, वह स्थिर बुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है? अर्जुन स्थिर बुद्धू वाले लोगों की पहचान जानना चाहता है, जो कि आप भी जानना चाहते होंगे
  3. भगवान श्री कृष्ण कहते हैं, है अर्जुन , जिस काल में ये पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भली भांति त्याग देता है, और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में, वह स्थित प्रग्न कहा जाता है, भगवान कृष्ण ने बताया था कि आत्मा ही सबसे बड़ी सच्चाई है, मोह, इच्छा, कामना छोड़ना ही आत्मा के पास आने है, जिसको संतुष्टि, शांति के लिए किसी दूसरे के ऊपर निर्भर नहीं रहना पड़ता, वोही अपनी कामना को त्याग सकता है
  4. बुरा होने पर जिसके मन में दुख उत्पन्न न हो, अच्छा होने पर भी जिसका मन शांत रहे जो खुशी से पागल न हो, गुस्सा, डर, या प्रेम, जो सब कुछ एक ही भाव से देखता हो, उसकी बुद्धि स्थिर रहती है, और वही मुनि या योगी कहलाता है
  5. जिसमें लगाव नहीं है, शुभ हो या अशुभ, अच्छा हो या बुरा, जो दोनों को एक जैसे देखता है वही अपनी बुद्धि को स्थिर रखता है – इस श्लोक में भगवान समझ रहे हैं कैसे अलग अलग हालात में अपनी बुद्धि को स्थिर रखा जाए, कैसे सैयाम और धैर्य से हम अपने जीवन में अनुशासन ला सकते हैं, वार्ना चारों तरफ या तोह दुख की हाहाकार होगी या लोग खुशी से झूम रहे होंगे
  6. जैसे कछुआ अपना सारे अंगों को समेट लेता है, वैसे ही जब इंसान इन्द्रियों के विषय से इन्द्रियों को सब प्रकार से हटा लेता है, टैब उसकी बुद्धि स्थिर होती है, यानी दुनिया में रहकर भी दुनुयादारी से बचना ही बुद्धि को स्थिर करना है, अगर आप किसी के सामने बोहोत ही स्वादिष्ट कहना रख दें, तोह क्या वो खुद को रोक पाएगा? अगर आप किसी के सामने महँगे आभूषण और महँगे digital gadgets रख दें, तोह क्या वो खुद को रोक पाएगा? ना । इसी को जो संभव कर दे उसी की बुद्धि स्थिर रहती है। अगर दुनिया की वस्तुएं आपको लुभा नहीं पाती तोह आप अपनी बुद्धि को नियंत्रण में ला पाएंगे
  7. संभव है, की हम दुनिया की विषयों में रुचि ना लें, इससे हम दुनिया से दूर तोह हो जाएंगे लेकिन दुनिया के प्रति उनकी आसत्ती नहीं जाती – मैन की इच्छा को खत्म करके, आसत्ति को खत्म करने से ही बुद्धि स्थिर होगी – अगर आप दुनिया की वस्तुओं को ना भी बोल देते हैं तोह भी क्या आपका मन उन्ही में लगा हुआ है? आसत्ती, इच्छा खत्म करनी है, तभी तोह मोह खत्म होगा । मैन के लगाव को ही मोह कहते हैं ।
  8. जहां आप अपनी आसत्ति, अपनी इच्छा खत्म नहीं करते वहां इन्द्रियाँ एक बुद्धिमान पुरुष के मन को भी बलपूर्वक अपने वश में कर लेती हैं, सोचिए , न जाने कितने ही बार ऐसा होता है, के सुख दुख आपके वश में नहीं, आप सुख दुख के वश में हैं, कभी हंसी नहीं रुकती, तोह कभी रोना नहीं रुकता, तोह कभी गुस्सा नहीं रुकता, कभी भूक नहीं रुकती, तोह कभी नींद, और कभी कामवासना भी नहीं रुकती
  9. इन्द्रियों को वश में करके, भगवान को ध्यान में रख जो बैठता है, अपने कर्म, अपने कर्तव्य में जो ध्यान लगाता है, उसी की बुद्धि स्थिर हो जाती है, वो ईश्वर, अपने लक्ष्य के समीप हो जाता है – अगली बार आप कुछ भी करें तोह देखियेगा की वो काम आपकी इन्द्रियाँ आपसे करवा रही हैं, या आपका कर्म आपसे करवा रहा है – आप खुद ही समझ जाएंगे कि श्री कृष्ण क्या कहना चाहते हैं, इन्द्रियों के वश में न होकर, उन्हें अपने वश में करके ही आप अपनी बुद्धि को स्थिर कर पाएंगे
  10. विषयों के बारे में, अर्थात इच्छाओं के बारे में सोचते रहने से उसमें आसत्ति हो जाती है – और आसत्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है, और जब वो कामना पूरी नहीं होती तोह क्रोध उत्पन्न होता है – जिस तरह ज़्यादा खाने से भूक बढ़ती है, ज़्यादा सोने से नींद बढ़ती है, उसी तरह जब आप अपनी इच्छाओं के बारे में सोचते रहते हैं तब आप उन्ही में उलझ के रह जाते हैं – और उसे ही आसत्ती कहते हैं, आसत्ति के बढ़ने को, कामना कहते हैं, और कामने के न पूरा होने पर गुस्सा आता है, और तब आप अपनी समझ खो देते हैं
  11. सोचने की शक्ति कम हो जाती है, और जब सोच नहीं सकते तोह याद भी नहीं रख सकते, स्मृति में भ्रम हो जाने से, स्मृति यानी ज्ञान शक्ति का नाश हो जाता है, जब याद नहीं रख पाएंगे, टैब ज्ञान किसी काम नहीं आएगा, बुद्धि बेकार हो जाएगी, और बुद्धि का नाश हो जाने से पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है
  12. जो अपनी इच्छाओं को, अपनी आसत्ती को अपने नियंत्रण अर्थात control में रख पाते हैं, दोस्ती, शत्रुता, गुस्से या प्यार के बिना अपनी इन्द्रियों को भटकने नहीं देते , वो अंतःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त होते हैं, ऐसे लोगों को बाहरी नहीं, हार्दिक और अंदरूनी प्रसन्नता होती है – आनंद, खुशी, शांति कहीं बाहर नहीं होती दोस्तों, वो तोह हमारे अंदर होती है और हम उसे ढूंढते बाहर हैं – मोको कहाँ ढूंढे रे बंदे, में तोह तेरे पास
  13. अंदर से प्रसन्न होने पर दुख खत्म हो जाते हैं, और ऐसे प्रसन्नचित कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओरे से हटकर एक परमात्मा में ही भली भांति स्थिर हो जाती है – आप अपने लक्ष्य के बारे में औचिये, औचिये की उसे पूरी दुनिया में सबसे अच्छा, the best कैसे कर सकते हैं, और उसे पूरा करने में लग जाइए – फल का मत सोचिते, बस अपने कर्म को करते रहिए – और देखिए कैसी मानसिक शांति और सुकून मिलता है आपको
  14. जो पुरुष अपने मोह, आसत्ति या इच्छाओं को नहीं जीत पाते उनमें निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती, यानी कि वो स्पष्ट और सतिक निर्णय नहीं ले पाते – ऐसे मनुष्य कस अंतःकरण में भावना भी नहीं होती, भावना हीन मनुष्य को अहंती नहीं मिलती, और शांति हीन मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है – बीमार आदमी को क्या अच्छा खाना और क्या बुरा खाना, उसे कुछ अच्छा नहीं लगता , जो अंदर होता है वो बाहर आता ही है, जब आपके अंदर शांति नहीं होगी तब आप आनंद कभी भी प्राप्त नहीं कर पाएंगे
  15. जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु हर लेती है, जैसे हवा पानी में चलती हुई नाव की दिशा बदल देती है, वैसे ही विषयों में विचरती इन्द्रियों में से मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है, वह एक ही इन्द्रिय इस आयुक्त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है, अगर वो क्रोध में है तोह और कुछ भी नहीं सोच पाएगा, और अगर वो प्रेम में है तोह और किसी बात की उसे सुध भी नहीं रहेगी, जिस भी इन्द्रिय के वश में होगा उसे उस इन्द्रिय के अलावा कुछ भी समझ नहीं आएगा, इन इन्द्रियों के नियंत्रण से निकल के इनको आप के नियंत्रण में रखिये दोस्तों फिर देखिए, आप के लिए कुछ भी असंभव नहीं रहेगा , सब कुछ संभव हो जाएगा
  16. जिस पुरुष ने इन्द्रियों और इन्द्रियों से होने वाली इच्छाओं पर पूरी तरह रोक लगा रखी हैं, उसी की बुद्धि स्थिर है, और बुद्धि हमारा ध्यान ऐसी ऐसी जगह पर लेजाती हैं, जहां पर हम उलझ के अपना असली मकसद भूल जाते हैं । बुद्धि सहारा लेती है हमारी इन्द्रियों का, इसीलिए अगर बुद्धि पर विजय प्राप्त करनी है दोस्तों तोह इन्द्रियों को वश में करना ही होगा
  17. जो सेब के लिए रात्रि है, उस रात्रि में योगी ज्ञान के लिए, परमात्मा के लिए जागता है और साधना करता है और जो सबके लिए सांसारिक सुख है, जिसके लिए संसार में हर कोई जागता है, वओ सुख योगी के लिए रात के समान है। जब सब सोते हैं तब मेहनती बच्चा रात में जाग के पड़ता है और परीक्षा में वो ही अव्वल आता है
  18. नदियां समुद्र को विचलित नहीं करती, नदियां समुद्र में जा के समा जाते है, उसी तरह से स्थिर बुद्धि वाले पुरुष में सारी इच्छाएँ, सारे भोग समा जाते हैं और उसे विचलित नहीं करते। कोई आपको कुछ बुरा बोलता है और आप अपना आपा खो देते हैं, इसका मतलब आपका अपने आप पे नियंत्रण नहीं है, ऐसा नदी बनिये की कोई भी नदी, किसी भी तरह का गाली आपको विचलित न कर पाए, वही पुरुष परम शांति को प्राप्त होता है, भोगों को चाहने वाला नहीं
  19. जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओं को त्याग कर, ममता रहित, अहंकार रहित और स्पृहा रहित विचरता है, वही शांति को प्राप्त होता है, अर्थात वो शांति को प्राप्त है। कामना का , इच्छा का त्याग करना है, उससे मोह नहीं रखना है, घमंड नहीं करना है, दुनिया में रहकर भी दुनिया से अलग रहना है, ऐसे ही इंसान को शांति प्राप्त होती है, कामयाब वही होता है जो परेशान हुए बिना, अपने धुन में, अपने काम में लगा रहता है, सफलता उसी के ही पांव चूमती है
  20. हे अर्जुन, ये ब्रम्ह को प्राप्त हुए पुरुष की स्तिथि है, इसको प्राप्त करके योगी कभी मोहित नहीं होता और अंतकाल में भी ब्रम्हस्तिथि में स्थित होकर ब्रम्हानंद को प्राप्त हो जाता है। जो पुरुष ऐसा करने में कामयाब हो जाता है वो ब्रम्ह को प्राप्त हो जाता है, ब्रम्ह का मतलब है सबसे बड़ा सत्य, इससे आगे कुछ भी नहीं होता, ये जो सारे लक्षण है, उन लोगों के हैं, जो अपनी बुद्धि को स्थिर रखकर अपने लक्ष्य को प्राप्त करते हैं, स्वाभाविक है कि अगर हम इन बातों को अपने जीवन में उतार लें तोह हम भी अपने लक्ष्य से ज़्यादा दूर नहीं रहेंगे।
  21. ये था भागवद गीता का दूसरा अध्याय संख्ययोग – इस अध्याय में भगवान श्री कृष्णा ने हमें कर्म को समझाया, कर्म के प्रति हमारे उत्साह को बढ़ाया, और ये समझाया कि सिर्फ और सिर्फ कर्म में ही अपना ध्यान रखना और किसी भी बात में नहीं

अध्याय 3 – कर्मयोग

कर्म तोह हर पल, हर समय, हम सब जरते हैं, ऐसा कोई क्षण संभव नहीं जब हम कर्म किये बिना रह सकें। कुछ कर्म झूठ और फरेब से भरे होते हैं, और कुछ कर्तव्य के लिए किए जाते हैं, तोह फिर ऐसे कोनसे कर्म हैं जो हमें हमारे लक्ष्य तक ले जाएंगे? उसी का analysis भगवान श्री कृष्ण हमारे लिए करेंगे और हमलोग आम जन जन की भाषा में उसे समझेंगे।

  1. अर्जुन पूछते हैं – हे जनार्दन अगर आपको कर्म के मुकाबले ज्ञान बेहतर लगता है, तोह फिर हे केशव मुझे ऐसे भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं? – दोस्तों कितनी ही बार हमारे मन में भी न जाने कितनी ही बार ऐसे प्रश्न आते हैं कि कर्म आखिर क्यों करना
  2. भगवान श्री कृष्ण की बात सुनके अर्जुन की बुद्धि मोहित हो रही थी, समझने के बजाय वो और भी ज़्यादा उलझ रहा था – इसीलिए अर्जुन कहते हैं – एक बात बताइये प्रभु जिसपे मैं चल सकूँ, जिससे मेरी उलझन दूर हो सके, वो कहना चाहते हैं , भगवान confuse मत करिए
  3. भगवान श्री कृष्ण कहते हैं – इस दुनिया में दो प्रकार के निष्ठा, दो प्रकार के विश्वास हैं – एक है संख्या योग जिसका रिश्ता ज्ञान से है और दूसरा है कर्मयोग जिसका लेना देना सिर्फ कर्म से है – निष्ठा का अर्थ है कुछ भी करने की सबसे परिपक्व अवस्था , अपनी इन्द्रियों को अपने वश में कर परमात्मा में ध्यान लगाना ज्ञान योग से होता है, और इसको कहते हैं सन्यास या संख्या योग और दूसरा होता है कर्म योग, जिसका मतलब है निष्काम काम करके फल में आसत्ति ना रखना
  4. मनुष्य न तोह कर्मों को शुरू किये बिना निष्कर्मता अर्थात योग निष्ठा को प्राप्त होता है, और ना कर्मों को केवल छोड़ देने से सिद्धि यानी संख्या निष्ठा को प्राप्त होता है – दोस्तों ऐसा नहीं कि आप कर्म करें ही ना और स्वयं को सन्यासी कहें, ऐसे तोह दुनिया चल ही नहीं पाएगी – अपने कर्तव्य को छोड़ अगर आप सन्यासी बन जाते हैं और समझते हैं कि आपको मोक्ष मिल जाएगा – ये संभव नहीं है, ऐसा नहीं हो सकता कि आप अपने कर्मों को त्याग दें और खुद को कर्मयोगी कहें – कर्म को ना करने से या उसे हमेशा के लिए त्याग देने से कुछ भी हासिल नहीं होगा
  5. ऐसा हो ही नही सकता कि मनुष्य किसी काल में भी, क्षण मात्र के लिए भी बिना कर्म किये रह जाये – हमारी दुनिया ऐसी है, हम चाहे या ना चाहे कर्म तोह हमें करना ही पड़ेगा, कर्म ना करना भी कर्म करना ही है – जिस तरह प्रकृति ने हमे बनाया है उसका गुण यही है कि हम हर समय कर्म करें – प्रकृति में कभी कुछ रुकता नहीं, सांसें चलती हैं, समय चलता है, जीवन का चक्र, प्रकृति का चक्र चलता ही रहता है – जब तक जीवन रहेगा तब तक कर्म भी रहेगा इसीलिए ये आवश्यक है कि कर्म को समझ जाए और उसे किया जाए
  6. जो सिर्फ दिखावा के लिए अपनी इंद्रियों को ज़बरदस्ती ऊपर से रोक कर, लेकिन अंदर मन से हमेशा उन्ही के बारे में सोचता है वह मिथ्याचारी अर्थात झूठा और घमंडी – खाना खाने से तोह मन कर दिया लेकिन खाने और उसके स्वाद के बारे में ही सोचता रहे तोह ये कैसा उपवास हुआ – इसे व्रत नहीं मन जाएगा – कितने ही साधु सन्यासी आपको मिलेंगे जो कहेंगे कि उन्होंने दुनिया को त्याग दिया है, कर्म को त्याग दिया है, लेकिन अगर उनके मन में इस दुनिया के लिए लालसा है, इच्छा है तोह कृष्ण उन्हें झूठा और पाखंडी बताते है
  7. हे अर्जुन जो मनुष्य सच्चे मन से अपनी इन्द्रियों को अपने वश में कर, उनसे बिना लगाव लगाए काम करता है, वोही कर्म योग का पालन करता है , वही श्रेष्ठ है, भगवान श्री कृष्ण एक तरह से चेतावनी दे रहे हैं कि इन्द्रियों को तोह अपने वश में करना ही है, साथ ही साथ मन का उन इन्द्रयों से किसी भी विषय से लगाव नहीं होना चाहिए – उसे ही कर्मयोग माना जाएगा – जब इन्द्रियाँ वश में होती है तब आप कुछ भी कर सकते हैं, किसी भी तरह की बाधा, disturbance आपको आपके काम से रोक नहीं सकती । और अगर आप इन्द्रियों के वश में हैं तोह चाहे वो स्वादिष्ट खाने की महक ही क्यों न हो, कोई रूप सी नारी ही क्यों न हो, आसपास का शोर ही क्यों न हो, छोटी या बड़ी हर बाधा आपको आपका काम करने से रोकेगी
  8. हे अर्जुन तू केवल कर्तव्य निभा क्योंकि कर्म ना करने के मुकाबले कर्म करना बेहतर है, तथा कर्म ना करने से तेरा ज़िंदा रहना भी तोह possible नहीं – अर्थात तू शस्त्र उठा और युद्ध कर, अपना कर्म कर, क्योंकि ये कर्म ना करने से कहीं अच्छा है – कहने का मतलब है, की कर्म तोह बोहोत सारे हैं, लेकिन एक चुना हुआ है, उस चुने हुए कर्म को ही निर्धारित कर्म कहते हैं – अपनी मर्ज़ी से अगर आप कर्म चुन लेंगे तोह उसे निर्धारित नहीं माना जाएगा – आपको अपना कर्तव्य समझकर, अपना कर्म चुनना होगा – अथवा जो कर्म आपको मिला है उसे आपको कर्तव्य समझकर निभाना होगा
  9. यज्ञ वो होता है जिसमें सब लोग शामिल होते हैं – भगवान श्री कृष्ण कहते हैं – यज्ञ के लिए किए जाने वाले कर्मों से ही मनुष्य समुदाय कर्मों से बंधता है – इसीलिए हे अर्जुन तू इच्छाओं को छोड़कर उस यज्ञ के लिए ही भली भांति कर्तव्य कर्म कर – यज्ञ अर्थात समाज और प्रजा की भलाई के लिए किया गया निस्वार्थ काम – हमको भी अपने कर्तव्यों को यज्ञ समझ ऐसे कामों में अपना योगदान देना चाहिए – जिससे समाज का भला हो – अगर हम सब अपने काम को यज्ञ समझ उसे सम्मानपूर्वक करें तोह सबका भला होगा, उसे ही आप निर्धारित कर्म भी मानिए
  10. प्रजापति ब्रम्हा नें इस दुनिया की शुरुवात में इस यज्ञ को रचकर अपनी जनता से कहा कि तुमलोग इस यज्ञ के द्वारा वृद्धि को प्राप्त हो और यह यज्ञ तुम लोगों को इच्छित भोग प्रदान करेगा – घरों में जो यज्ञ किये जाते हैं उन्हें एक धार्मिक कर्म कांड ना समझकर उसकी importance समझनी चाहिए , यज्ञ हमारे संस्कारों का एक संगठित रूप है, संस्कार मतलब काम करने का सबसे उत्तम तरीका – यज्ञ से हम हर विधि को, संस्कार को, एकदम उचित तरीके से पूरा कर अपने कर्म को शुरू करते हैं, यज्ञ एक तरीके से हमें रास्ता दिखाता है, अगर आगे भी संस्कारों का पालन होगा तोह धेय अर्थात हमारा goal, हमारा aim, ज़रूर पूरा होगा
  11. ब्रम्हा कहते हैं कि यज्ञ से सब लोगों को, देवताओं को खुश करना चाहिए, और फिर वो देवता खुश होके, हम सबकी भलाई करेंगे – इस प्रकार निस्वार्थ भाव से एक दूसरे को उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे – यज्ञ तरीका है देवताओं को खुश करने का और उसके बदले में देवता आपको खुश रखते हैं, आपकी उन्नति करते हैं , इसीलिए काम शुरू करने से पहले, कुछ भी शुभ करने से पहले ईश्वर का नाम लेना विधान है, यही ईश्वर का नाम जब सही तरीकों, सही पद्धति, सही methods के साथ किया जाता है तोह उसे यज्ञ कहते हैं, यज्ञ को अपने और देवताओं के बीच का एक medium मान लीजिए जिससे दोनों के बीच संबंध बना रहता है।
  12. यज्ञ करके जब आप देवताओं की पूजा करते हैं – तब देवता आपके बिना मांगे ही आपकी सारी इच्छाओं को पूरा कर देते हैं – लेकिन जो यज्ञ नहीं करता, उस यज्ञ से देवताओं को रणाम नहीं करता लेकिन फिर भी अपनी इच्छाओं को पूरा करना चाहता है उन्हें चोर समझना चाहिए – कुछ देने से कुछ मिलता है, कुछ करने से कुछ मिलता है, बिना अर्ग, चढ़ाए, बिना पूजा किये अगर कोई चाहता है कि उसकी मनोकामना पूरी हो जाये, बिना कुछ काम किये अगर कोई सोचे के उसका काम बन जाये तोह इसे बईमानी या चोरी ही तोह कहा जायेगा
  13. यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं, और जो पापी लोग अपना शरीर पोषण करने के लिए ही अन्न पकाते हैं वे तोह पाप को ही खाते हैं, हम क्या सिर्फ खा के जिंदा रहने और मर जाने के लिए ही पैदा होते हैं? ऐसे जीवन का क्या मतलब हुआ? अपने जीवन का purpose, उसका उद्देश्य हमे समझना चाहिए, इस ब्रम्हांड नें हम क्यों हैं, क्यों हमें ईश्वर या मोक्ष को प्राप्त करना है, इन सब को समझने के लिए ही यज्ञ जैसे अनुष्ठान किये जाते हैं, जो लोग यज्ञ या ईश्वर को याद किये बिना सिर्फ अपने ज़िंदा रहने में लगे रहते हैं उन्हें चोर समझना चाहिए ।
  14. अगर अन्न खत्म हो जाये, तोह सब खत्म हो जाएंगे, सम्पूर्ण प्राणी जगत, हर कोई अन्न से उत्पन्न होते हैं। अन्न की उत्पत्ति बारिश से होती है, और बारिश यज्ञ से होती है, और यज्ञ कर्मों से उत्पन्न होती है, और कर्म की उत्पत्ति वेद से । हमारी संस्कृति का सारा ज्ञान वेद से ही तोह आया है। कर्म क्या है? उसकी परिभाषा भी वेद से आयी है, और वेद परम पिता परमात्मा से उत्पन्न हुए हैं। वेद ईश्वर से आया ज्ञान है, वेद से आगे और वेद से बड़ा कुछ भी नहीं है – इससे ये सिद्ध होता है कि यज्ञ और ईश्वर में सीधा संबंध है।
  15. श्री कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं -हे पार्थ, जो पुरुष परंपरा से नहीं चलता, जो सृष्टि चक्र, प्रकृति के नियमों का पालन नहीं करता, मतलब जो अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता, वह इन्द्रियों के द्वारा भोगों में रमण करने वाला, पापायु पुरुष व्यर्थ ही जीता है – ऐसा इंसान बस इन्द्रियों के वश में रहकर ज़िंदा रहता है। जीत है और मर जाता है। उसके जीवन मृत्यु का चक्कर चलता ही रहता है, चलता ही रहता है। ऐसे इंसान का जीने और मारने का कोई मतलब नहीं। वेदों में , ग्रंथों में जो ज्ञान, नियम बनाये हैं उनका एक खास मतलब है, और उस मतलब के अनुसार हमको अपना जीवन जीना चाहिए।
  16. श्री कृष्ण कहते हैं -जो मनुष्य आत्मा में ही रमन करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही संतुष्ट हो उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है, आत्मा का मतलब यहां सबसे बड़ा सच है, और जो सत्य को समझता है, सत्य में ही खुश रहकर सत्य में ही रहता है। उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है, जिसको ज्ञान प्राप्त हो चुका है, जो जीवन की सच्चाई जान चुका है, सिर्फ वोही ऐसा है जिसके लिए कर्तव्य का कोई मतलब नहीं, लेकिन ऐसा कोई लाखों करोड़ों में ही एक होता है, बाकी हम सब के लिए कर्तव्य ही सब कुछ है
  17. ऐसे महापुरुष जो आत्मा को, सच को जान चुके हैं, उनके लिए कर्म करने का कोई प्रयोजन रहता ही नहीं, ऐसे महापुरुष कर्म के बंधन से छूट चुके हैं, क्योंकि ये ज्ञानी इस दुनिया और उस ईश्वर को समझ चुके हैं, इनका स्वार्थ से कोई मतलब नहीं रहता, इसीलिए ये महापुरुष हमारे जैसे लोगों से एकदम अलग हैं, इनपर वो नियम लागू नहीं होते जो हमारे जैसे दुनियादारी में लगे हुए लोगों पर लागू होते हैं ।
  18. हे अर्जुन इसीलिए तू लगातार अपनी आसत्ति, अपनी इच्छा को छोड़ कर हमेशा अपने कर्तव्य कर्म को ठीक तरह से करता रह – अपनी इच्छाओं को, अपनी कामनाओं को छोड़ कर सिर्फ और सिर्फ कर्तव्य को पूरा करने में लग जा – क्योंकि आसत्ति से, लगाव से छूट कर जो भी अपना कर्म करता है, वो मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है – कार्यव्य का रास्ता आसान नहीं होता, कितनी ही बार हम सबको लगता है कि सब कुछ छोड़ कर आराम करें, देर तक सोएं या मेहनत ना करें, लेकिन उससे कभी कुछ भी हासिल नहीं होता, ऐसा श्री कृष्ण समझा रहे हैं
  19. बोहोत से ऐसे लोग हैं जो कर्म करते हुए ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे, बोहोत से ज्ञानी महापुरुष तोह ऐसे होते हैं जो आत्मा की सच्चाई को पहचान जाते हैं, लेकिन बाकी लोगों के लिए, सिर्फ कर्म ही एक रास्ता है अगर उन्हें जीवन में कुछ करना है तोह – अगर आप चाहते हैं कि आपके जीवन का कोई मतलब हो, जन्म लेना , ज़िंदा रहना और फिर मर जाना ऐसे बेकार जीवन से बचकर अगर आप कुछ करना चाहते हैं तोह आसत्ति यानी attachment से बचते हुए आपको सिर्फ अपना कर्म करना चाहिए, और अपने कर्तव्य को पूरा करना चाहिए
  20. Leader जो होता है ना, वो आगे चलता है, और बाकी सब उसके पीछे पीछे, इसीलिए आपको ये फैसला करना है कि आप आगे चलने वाले हैं या पीछे – कृष्ण कहते हैं कि श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा वैसा ही आचरण करते हैं, वो जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य समुदाय उसी के समान बरतने लग जाता है – कहने का मतलब है, जो हमारे idols होते हैं हम उन्ही को follow करते हैं, किसी भी field को ले लीजिए, कुछ ऐसे लोग होते हैं जो उस field में सर्वश्रेष्ठ होते हैं, और पूरी दुनिया उन्ही के जैसा करने की कोशिश करती रहती है – लीडर एक होता है और followers अनगिनत, तोह दोस्तों आप क्या बनना चाहते हैं? आगे या पीछे? Leader या Follower?
  21. कृष्ण कहते हैं -हे अर्जुन, मेरा इन तीनों लोकों में कुछ भी कर्तव्य नहीं है, और ना ही ऐसी कोई वस्तु है जिसे मैं प्राप्त नहीं कर सकता, तोह भी मैं कर्म में ही बरतता हूँ – श्री कृष्ण से बड़ा Leader कौन होगा दोस्तों, लेकिन वो भी कर्म करते हैं, वो भी कर्म करते हुए अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हैं, कृष्ण ने महाभारत में युद्ध लड़ने से मन नहीं किया, उनकी नारायणी सेना कौरवों के साथ थी, लेकिन वो खुद अर्जुन के साथ, वो अर्जुन के सारथी बने, जब कृष्ण अपना कर्म करके अपने कर्तव्यों को पूरा कर रहे हैं, तोह हम कौन होते हैं, हम क्या हैं? हम क्यों अपना कर्तव्य ना करें?
  22. कृष्ण कहते हैं -हे पार्थ, अगर मैं अपने कर्मों को करने में सावधानी ना बरतुं तोह बड़ा अनर्थ हो जाएगा – हर कोई श्री कृष्ण को follow करता है, अगर आपका leader ही कुछ नहीं करेगा, अगर भगवान ही कुछ नहीं करेंगे तोह मनुष्य तोह सब कुछ करना छोड़ देंगे – जो सबसे बड़ा होता है, leader होता है, सर्वश्रेष्ठ होता है, सब उसके पीछे चलते हैं – अब अगर श्री कृष्ण ऐसा सोचते कि मैं तो भगवान हूँ, और मैं कर्म नहीं करूंगा , तोह उन्हें किसी को ज्ञान देने का क्या अधिकार रह जाता, ईश्वर होते हुए भी उन्होंने अपने हर कर्तव्य का पालन किया, कर्म से कभी पीछे नहीं हटे, उनके पग चिन्हों पर ही अब हमें चलना है, और कोशिश करनी है सर्वश्रेष्ठ बनाने की
  23. श्री कृष्ण बता रहे हैं – कि यदि मैं कर्म ना करूं तोह ये सब मनुष्य नष्ट भृष्ट हो जाएं और मैं संकरता का करने वाला होऊंगा तथा मेरी वजह से सारी प्रजा नष्ट हो जाएगी – अगर कृष्ण कर्म नहीं करेंगे तोह दोस्तों दुनिया खत्म हो जाएगी, मनुष्य नष्ट हो जाएंगे – सोचिये ये दुनिया उन्ही की तोह माया है, लीला है, खेल है , और जिसने खेल को रच है, अगर वोही अपना कर्म नहीं करेगा तोह दुनिया में क्या बचेगा, चाहे वोह ईश्वर हो या साधारण इंसान, नियम तोह सब पर लागू होते हैं, अगर कर्म का नियम है तोह वो कृष्ण को भी करना पड़ेगा और हमें और आपको भी
  24. हे भारत, जिनमे समझ नहीं होती ना, वो कर्म में आसत्त होकर काम करते हैं, विद्वानों को और समझदारों को बिना लगाव के कर्म करना चाहिए। क्या यज्ञ करने से हम ज्ञानी हो जाते हैं? कर्म को सही विधि करने से क्या हम ज्ञानी हो जाते हैं, कर्म करना है लेकिन उससे आसत्ति, attachment नहीं रखनी है और ऐसा करना आसान नहीं है, अगर कोई ऐसा ज्ञानी है, जिसका कर्मों से कोई लेना देना नहीं, जैसे कि साधु सन्यासी, जिनकी कर्म में आसत्ति नहीं, तोह ऐसे लोगों को समाज सेवा में लग जाना चाहिए – ये उनके लिए कहा गया है जिनको लगता है कि दुनिया छोड़ सन्यासी बनने से उन्हें भगवान या सत्य की प्राप्ति हो जाएगी
  25. जो ज्ञानी हैं, जिन्हें ईश्वर की सच्चाई मालूम हो चुकी है, उनकी ये ज़िम्मेदारी बन जाती है, के उनके काम करने के तरीके से कहीं किसी और के मन में कर्म के प्रति अश्रद्धा, अपमान, ये सब पैदा ना हो जाए, आप किसी ज्ञानी को देख ये सोच सकते हैं के वो कुछ करते ही नहीं, तोह मैं भी ना करूं, इसीलिए ये उन ज्ञानियों, उन महापुरुषों के लिए ज़रूरी है के वो ऐसा उदाहरण उनके सामने रखे जिससे हर कोई अपना कर्म, अपना कर्तव्य करने के लिए प्रेरित हो – दोस्तों , साधु को देख अगर सब अपना घर बार, परिवार और दुनिया छोड़ने लगे तोह दुनिया चल नहीं पाएगी
  26. हर इंसान की एक प्रकृति होती है, एक Nature होता है, अपनी उस प्रकृति के अनुसार ही वो कर्म करता है, हर कर्म उस प्रकृति के गुण के हिसाब से ही होता है – जिसके अंदर घमंड भरा होता है वो सोचता है के मैं करता हूँ, मतलब के करने वाला वो है, ऐसा सोचने वाले को अज्ञानी कहा गया है – आप जो भी काम करते हैं, उस काम को करवाने वाली आपकी प्रकृति है, उस प्रकृति के गुण हैं, कितनी ही बार ऐसा होता होगा के गुस्से में आप कुछ ऐसा कर जाते हैं जो आप नहीं करना चाहते थे, वो आपका क्रोध आपसे करवा देता है – सोचिये और समझने की कोशिश करिए कि आपकी प्रकृति क्या है
  27. सात्विक, राजसिक और तामसिक – तीन तरह की प्रवृत्तियां होती हैं, फिर उनके गुण विभाग और कर्म विभाग होते हैं – इस तरह से समझ लीजिए के अलग अलग nature के attributes होते हैं – इन्ही गुणों के वजह से आप कर्म करते हैं, जसे, अगर तामसिक गुण रहेगा गोह आप आलास या नींद, य इसी तरह के बुरे कर्म करेंगे, राजसिक गुण वाला बात बात पर शौर्य बहादुरी दिखाने की कोशिश करेगा, जो ज्ञानी होते हैं वो जानते हैं के वही गुण उनसे कर्म करवा रहे हैं – और जो ज्ञानी नहीं होते, हम जैसे ज़्यादातर लोग, वो समझते हैं, सब कुछ वोही कर रहे हैं
  28. कर्म में लगे हुए ज्ञानियों को ये जानना चाहिए के गुण ही उनसे कर्म करवाते हैं, वो खुद कुछ भी नहीं करते, आर जब ज्ञानी इस बात को समझ लें, तोह ये उनकी जिम्मेदारी होती है कि वो अज्ञानियों को समझाएं के कर्म ही उनका धर्म है – ज्ञानी अर्थात के पहुंचे हुए लोग, वे ये बात जान जाते हैं के उनके अंदर के गुण आते जाते रहते हैं, बदलते रहते हैं, और इन्ही गुणों के अनुसार उनके कर्म भी बदलते रहते हैं, इसीलिए वो इन कर्मों को करने वाला खुद को कभी नहीं मानते हैं, बस काम करते हैं और बाकी सब कुछ, ईश्वर को सौंप देते हैं – दोस्तों हमें भी बस कर्म करके बाकी सब कुछ भगवान पर छोड़ देना चाहिए
  29. कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, के तू मुझे अंतर्यामी परमात्मा में, अपने सारे कर्मों को अर्पण कर दे, आशा को छोड़, ममता को छोड़, और दुख को दूर करके युद्ध कर – दोस्तों, अपने सारे कर्म हमें भगवान को सौंप देने चाहिए, कोई आशा नहीं, ममता नहीं और कोई दुख नहीं, कुछ भी भाव नहीं होना चाहिए, तू जा बस युद्ध कर, इसी को आप formula मान लीजिए सफलता का, जी हां सफलता का, कुछ भी करने का, आगे बढ़ने का, आशा, ममता, दुख, सब कुछ भूल के बस काम में लग जाइए और उन्नति करते जाइये
  30. जीवन का मकसद है मोक्ष प्राप्त करना, जीने मारने के चक्कर से बचना, निष्काम कर्म का अगला कदम वही होता है, इसी के बारे में कृष्ण कहते हैं, कि जो कोई मनुष्य दोष दृष्टि से रहित और श्रद्धा युक्त होकर मेरे इस मत का सदा अनुसरण करेगा वो सारे कर्मों से छूट जाएगा। जो भी कोई सुख दुख और मोह को छोड़कर बस अपने कर्म को सिर्फ मुझे अर्पण करता है और कर्म को सच्चे मन से करता है वो कर्म के सारे बंधन से छूट जाता है, और कर्म के बंधन से छूटने के अर्थ है, जन्म मृत्यु के चक्कर से बचना
  31. कृष्ण कहते हैं की कई लोग घमंड करके खुद को बोहोत बड़ा समझते हैं, उन्हें लगता है कि वोही करते हैं, सब कुछ वही करते हैं, उन्हें नहीं लगता कि उन्हें अपना कर्म, श्री कृष्ण को, ईश्वर को अर्पण करना चाहिए । ऐसे लोग अपने झूठे ज्ञान में ही मस्त रहते हैं – कृष्ण उन्हें मूर्ख बताते हुए उनसे दूर रहने की सलाह दे रहे हैं – आपको अपने चारों तरफ कई सारे घमंडी दिख जाएंगे दोस्तों जिन्हें लगता है कि वो कुछ गलत नहीं कर रहे, अपने धन और अपने ज्ञान के अहंकार में किसी की बात तक सुनने को तैयार नहीं होते – ऐसे लोगों को मूर्ख समझकर आप उनसे दूर ही रहें
  32. सभी प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते हैं, अर्थात अपने स्वभाव से मजबूर होकर कर्म करते हैं । ज्ञान भी अपने प्रकृति के अनुसार कोशिश करता है , फिर इसमें किसी का हट क्या करेगा – कृष्ण ये समझा रहे हैं कि हर प्राणी का अपना एक स्वभाव होता है, Nature होता है, Attitude होता है, सब उसी के चलते काम करते हैं, जो ज्ञानी हैं, सब कुछ जानते हैं, उनसे भी उनका काम, उनकी प्रवृत्ति ही करवाती है, उसमें किसी की हट, ज़िद कुछ भी नहीं कर पायेगी । अगर आप कोशिश करेंगे कि किसी से उसके Nature के against काम करवा लें, तोह आप अपना सिर्फ Time Waste कर रहे हैं
  33. इन्द्रियों में ही प्यार और इन्द्रियों में ही क्रोध यह द्वेष छुपा है, मनुष्य को उन दोनों के वश में नहीं होना चाहिए, क्योंकि वे दोनों ही इसके कल्याण मार्ग में विघ्न करने वाले महान शत्रु हैं – अर्थात इन्द्रियों में ही हर तरह का भाव छुपा है, अच्छा भाव भी और बुरा भाव भी, अच्छे और बुरे दोनो ही भाव में हमे नहीं फसना चाहिए – क्योंकि इसी फंसने से ही हमारे मोह की शुरुवात होती है और फिर इन इन्द्रियों के चक्कर में हम फंसते हुए चले जाते हैं और कभी भी निकल नहीं पाते – काम, क्रोध, मध, लोभ और मोह को हमें अपना शत्रु मनना चाहिए
  34. कृष्ण कहते हैं – अच्छी प्रकार आचरण में लाये हुए दूसरे के धर्म से गुण रहित भी अपना धर्म अति उत्तम है – अपने धर्म में तोह मरना भी कल्याणकारक है , और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है – हर किसी को अपना कर्तव्य, अपना कर्म, और अपना धर्म ही करना चाहिए – कृष्ण कहते हैं के अगर अपने धर्म के लिए मरना भी पड़े तोह भी अच्छा है, लेकिन किसी दूसरे के धर्म को स्वीकार नहीं करना चाहिए – कोई बेहद कमज़ोर जिसे खुद पर विश्वास ना हो वो दूसरे के धर्म को अपनाता है, जिसमे थोड़ा सा भी आत्मसम्मान होता है ना वो कभी दूसरे के धर्म को नहीं अपनाता ।
  35. अर्जुन केते हैं – हे कृष्ण, तोह फिर ये मनुष्य खुद ना चाहते हुए भी ज़बरदस्ती किस बात से प्रेरित होकर पाप का काम करता है – अर्जुन याहं पर बड़ा Valid सवाल करते हैं – क्यों मनुष्य कृष्ण के कहे अनुसार नहीं चल पाता? क्यों वो पाप के रास्ते पर चलता है? ऐसा क्या हो जाता है लोगों के साथ के वो सही रास्ते पर नहीं चल पाते? गलत रास्ते पर क्यों चलने लगते हैं? चाहे वो इस बात को जानते हों, या न जानते हो, वो क्या चीज़ है जो उन्हें विवश करती है? पाप के लिए उनकी बुद्धि, उनके मन, उनके गुण, किस बात को दोष दें ?
  36. श्री भगवान कहते हैं – रजोगुण से उत्पन्न होता है काम, और काम में से निकलता है क्रोध, अर्थात गुस्सा – काम या क्रोध कभी रुकता नहीं अर्जुन , बस बढ़ता ही रहता है – इसको अपना सबसे बड़ा शत्रु मनना चाहिए – श्री कृष्ण बात रहे हैं के आखिर पापी पाप किस कारण करता है – किसी के पाप करने की वजह क्या होती है – वजह है रजोगुण – इसी की वजह से काम क्रोध या राग द्वेष जैसे भाव पैदा होते हैं, जो की पाप की वजह होते हैं , इन्ही द्वेषों को श्री कृष्ण शत्रु बताते हैं – इन भावों के मन में आते ही आपको समझ जाना चाहिए कि आप पर शत्रु हावी हो रहा है – और आपको उसे रोकने के ज़रूरत है।
  37. जिस तरह धुंए से आग और धूल से दर्पण ढक जाता है, तथा जिस तरह से जेर से गर्भ ढक रहता है – वैसे ही उस काम द्वारा हमारा ये ज्ञान ढका रहता है, राख जलती रहती है और उसके धुएं में आग छुपी रहती है, शीशे पर अगर धूल हो चेहरा साफ नहीं दिखता, उसी तरह से जब ये काम, क्रोश जैसे विकार, ये जो कमियां हैं, हमारे अंदर में मौजूद ज्ञान को छुपा के रखती हैं – सब कुछ हमारे अंदर हैं, बाहर कुछ भी नहीं – ये ऐब, कमियां, हमारे अंदर रहकर असली ज्ञान को छुपाकर एक तरह से हमें विवश कर देती हैं और हमें पाप करने के लिए उत्साहित करती हैं, इसलिए श्री कृष्ण इन्हें शत्रु बताते हैं।
  38. हे अर्जुन ये ऐसी आग है – जो कभी बुझती ही नहीं, इस आग का मगलब है काम, और इसी से मनुष्य का ज्ञान ढका हुआ है। भोगों से कभी कोई तृप्त नहीं हुआ है, पैसा अगर कमाया है तोह और कमाना है, खाना अगर खाया है तोह और खाना है, भोगों का कोई अंत नहीं होता बल्कि ये भोग मनुष्य का अंत करके ही मानते हैं, जैसे आग को अगर ईंधन मिलता रहे तोह वो कभी बुझती नहीं, इन भोगों को जब आप बढ़ाते हैं, तोह आप जलती हुई अग्नि में ईंधन ही डाल रहे हैं – काम, क्रोध, मध, लोभ और मोह को नियंत्रण में रखना ही इस आग को बुझाने का एक तरीका है ।
  39. कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि इन्द्रियाँ मन और बुद्धि, ये सब इसके घर कहे जाते हैं – ये काम इन मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा ही ज्ञान को ढक के जीवात्मा को मोहित करता है – काम, क्रोध जैसे विकार कमियां इन्द्रियों,मन और बुद्धि में रहते हैं – ये इनके घर हैं, जहां इनका निवास होता है – घर में रहकर ये कमियां, घर के मालिक को मोहित कर उसे ही खत्म करने की कोशिश करती हैं – कुछ अच्छा देख मन में लालच आता है, काम पूरा ना होने पर क्रोध आता है, इसी तरह से ये कमियां, हमारे दिल, दिमाग पर कब्ज़ा करना शुरू करती हैं – और हम हमेशा इनके वश में रहते हैं
  40. हे अर्जुन तू पहले इन्द्रियों को सैयामित कर इस ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले महान पापी काम को कुछ भी करके बल पूर्वक, मार दे – कृष्ण अर्जुन को सलाह देते है के इससे पहले की काम क्रोध जैसे शत्रु तुझ पर कब्ज़ा कर लें, तू अपनी इन्द्रियों को वश में करके अपने काम क्रोध को मार दे – ये काम और क्रोध ही हैं, जो हमारे अंदर के ज्ञान को खत्म कर उसमें शंका भरते हैं – हमें हमारे रास्ते से भटकाते हैं – कितनी ही बार आपके साथ भी होता होगा – की कोई ज़रूरी काम करते हुए आराम करने का मन करता होगा – बस यही वो वक़्त होता है जब हमें अपनी इन्द्रियों को वश में करना होता है।
  41. इन्द्रियों को स्थूल शरीर से बेहतर बलवान और सूक्ष्म यानी कि settle कहते हैं, इन इन्द्रियों से बेहतर मन है, मन से भी बेहतर बुद्धि है, और जो बुद्धि से भी बड़ा है वो आत्मा है – कृष्ण कहते हैं कि हमारे शरीर से श्रेष्ठ हमारी इन्द्रियाँ हैं, सही बात है, किसी भी शरीर को उसकी इन्द्रियाँ पल भर में वश कर लेती हैं, लेकिन इन्द्रियों से बड़ा मन है, आप अपने मन से इन्द्रियों को control कर सकते हैं, और मन से बड़ी बुद्धि है, और बुद्धि से बड़ी है आत्मा, और इसी आत्मा को समझने का ये सारा खेल है
  42. कृष्ण अपनी बात को समझाते हुए कह रहे हैं – के हे अर्जुन – इस प्रकार बुद्धि से बेहतर, अर्थात सूक्ष्म बलवान और अत्यंत श्रेष्ठ आत्मा को मान – बुद्धि से अपने मन को वश में कर और हे महाबाहु तू इस काम रूप दुर्जय शत्रु यानी कि invincible enemy को मार डाल – बुद्धि से मन को वश में करना है – अगर मन वश में हो गया – तोह आप इन्द्रियों को भी वश में कर लेंगें – जब मन और इन्द्रियाँ आपके वश में हैं, तोह फिर उसका अगला कदम होगा, आत्मा के पास पहुंचना – आत्मा परमात्मा का ही एक रूप है – और आपकी बुद्धि आपको आपके आत्मा के करीब पहुंचा सकती है

अध्याय 4 – ज्ञान, कर्म, सन्यास योग

  1. श्री भगवान बोले – मैंने इस कभी खत्म ना होने वाले योग को सूर्य से कहा था, सूर्य ने ये जानकारी अपने पुत्र वैवस्वत मनु को दी, और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा – श्री कृष्ण एक योगी थे – सृष्टि के beginning और end सब कुछ वो जानते थे – वो हर समय मौजूद थे और वो हमेशा ही मौजूद भी रहेंगे, योह अर्थात ज्ञान योग और कर्म योग, जिसका कभी नाश नहीं हो सकता – आखिर कहां से आया इस योग का ज्ञान, भगवान श्री कृष्ण उसी की जानकारी दे रहे हैं।
  2. हे परंतप अर्जुन, पारम्परा चलती रही और कई राजर्षियों को इसकी जानकारी हो गई, लेकिन उसके बाद वह योग बोहोत काल से इस पृथ्वी लोक में गायब हो गया – ज्ञान कहीं न कहीं से आता है, और उसके बाद वो धीरे धीरे फैलना शुरू होता है – ये ज्ञान कृष्ण से सूर्य और इस तरह गीता के माध्यम से हम लोगों तक आया, सैकड़ों हज़ारों सालों के सिलसिला है ये तोह, लेकिन बीच में ऐसा भी समय था जब ये ज्ञान योग पृथ्वी पर से गायब हो गया था, ज्ञान बढाने से बढ़ता है, और घटाने से खत्म होने लगता है
  3. ख़ज़ाने को खुले में नहीं रखा जाता उसी तरह से रहस्य भी खुल के सामने नहीं आता, धीरे धीरे आता है – कृष्ण अर्जुन से कहते हैं – तो मेरा भक्त और प्रिय सखा है, इसलिए वही ये पुरातन योग आज मैंने तुझसे कहा है, क्योंकि ये बड़ा ही उत्तम रहस्य है, अर्थात गुप्त रखने योग्य विषय है – अर्जुन कृष्ण का भक्त भी है और मित्र भी इसीलिए कृष्ण उसे ये सदियों पुराना योग बता रहे हैं, सिखा रहे हैं और ये भी कह रहे हैं की वैसे तोह यह गुप्त रखने के बात है, लेकिन वो अपना सब कुछ अर्जुन को बता रहे हैं, यहां पर गुप्त रखने से मतलब है कि इतने बड़े ज्ञान का सम्मान हो, इसे सामान्य विद्या न समझा जाए
  4. अर्जुन एकदम हमारे जैसा ही मानव है, हमारे जैसे ही सवाल उसके मन में भी आते हैं – किसी भी बात को जादू की तरह मान लें के सूर्य का जन्म तोह असंख्य सालों पहले हुआ और कृष्ण यहां सामने खड़े हैं, तोह कब ये योग सूर्य को बताया गया और कैसे – यहि सवाल अर्जुन श्री कृष्ण से कर रहे हैं
  5. दोस्तों भक्त नहीं जानता लेकिन भगवान सब जनता है, साधक यानी कि साधना करने वाला ये नहीं जानता लेकिन महा पुरुष सब कुछ जानता है, जो आंखों से दिखता है वो तोह सब जान सकते हैं – इसमें special क्या है, जो अव्यक्त है, जो unexplained है उसे सिर्फ महापुरुष ही जान सकते हैं – श्री भगवान बोले – हे परंतप अर्जुन, मेंरे और तेरे बोहोत से जन्म हो चुके हैं, उन सबको तू नहीं जानता किन्तु मैं जानता हूँ – यही कृष्ण के रहे हैं कि अर्जुन उनको साधारण जन्म लेने वाला, हमारे जैसे शरीर वाला ना समझे – ये बात हमारे लिए भी आवश्यक है कि कृष्ण को हम कैसे और क्या समझें
  6. कृष्ण अपने रूप, अपने अस्तित्व को समझाते हुए कह रहे हैं – मैं अजन्मा हूँ, यानी मेरा कभी जन्म नहीं हुआ, मैं अविनाशी हूँ, अर्थात मेरा कभी नाश नहीं हो सकता, मैं समस्त प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योग माया से प्रकट होता हूँ – जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु निश्चित है – तोह जिसे अर्जुन देख रहा था , वो क्या था? क्योंकि वो तोह कभी जन्मे ही नहीं, तोह कृष्ण की existance क्या थी? वो थी कृष्ण की योग माया, अपनी माया से कृष्ण ने खुद को ही प्रकट किया था, मनुष्यों में वो मनुष्यों जैसे आये थे, ताकि हम सबके बीच हमारे जैसे जीवन जी सके
  7. हे भारत जब जब धर्म की हानि होती है, अधर्म बढ़ जाता है, तब तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ और इस दुनिया के सामने प्रकट होता हूँ , हर काल मे धर्म का नासब होता है, यानी कि अधर्म बढ़ता है, corruption, पाप बढ़ने लगता है, टैब किसी न किसी की ज़रूरत पड़ती है जो आये और सब कुछ ठीक कर दे, जब जब धर्म खतरे में आता है, तब तब कृष्ण अपना एक रूप रचते हैं और हमारे बीच में प्रस्तुत होते हैं – और इसी प्रकट होने को ही अवतार कहते हैं, हर युग में आपको एक अवतार की कहानी मिलेगी जो धर्म की स्टेफन के लिए धरती पर जन्म लेता है
  8. धर्म को फिर से स्थापित करने के लिए हर युग में कृष्ण अवतार लेते हैं, लेकिन क्या है ये धर्म की स्थापना ? कृष्ण कहते हैं, साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए में युग युग में प्रकट होता हुआ करता हूँ, साधु का उद्धार यानी भला और पापियों को खत्म करना ही धर्म की रक्षा करना है – सच्चाई की राह छोड़के, गलत काम करना ही अधर्म है और कृष्ण अधर्म को खत्म करते हैं।
  9. कृष्ण कहते हैं, कि उनका जन्म अलौकिक है, यानी इस लोक का नहीं, जैसे हम सबका जन्म होता है, वैसे कृष्ण का जन्म नहिं हुआ – जो ये बात समझ लेता है, वो शरीर को त्याग कर फिर जन्म को प्राप्त नहीं होता बल्कि वो सीधे कृष्ण को ही प्राप्त होता है – मनुष्य के जन्म का एक तरीका है, हम वही समझ सकते हैं, लेकिन कृष्ण, उनक जन्म दिव्य और अलौकिक होता है, divine और इस दुनिया से अलग, इसीलिए उनके अस्तित्व को आसानी से नहीं समझा जा सकता – लेकिन जो भी कोई इस बात को समझ जाता है, वो भी जन्म और मृत्यु के चक्कर से निकल सीधा कृष्ण को ही प्राप्त होता है
  10. जिनमें मोह, डर अजर गुस्सा खत्म हो चुका है, जो कृष्ण से प्रेम करते हैं, जओ कृष्ण के भक्त हैं, उनके कहे ज्ञान पर सच्चे मन से चलते हैं, वो कृष्ण को ही प्राप्त हो जाते हैं, जीन्होंने अपने अंदर के मोह, गुस्से या डर जैसे भावों को खत्म कर दिया है, यानी कि अपनी इन्द्रियों को वश में कर लिया है और खुदको जो कृष्ण को सौंप चुके हैं उन्हें भगवान की प्राप्ति हो चुकी है, उन्हें मोक्ष मिल चुका है । अपनी इन्द्रियों को control करिये तभी आप भगवान की बातें समझ पाएंगे
  11. हे अर्जुन जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ, क्योंकि सभी मनुष्य मेरे ही बताये रास्ते पर चलते हैं – जो कृष्ण के ज्ञान को, उनके स्वरूप को और उनकी कही बातों को अच्छे से समझ जाता है वो एक तरह से कृष्ण में मिल जाता है – यहां भजन का मतलब पूजा पाठ या आरती नहीं है, सच्चे अर्थों में भगवान को भेजने का मतलब है, उसकी कही बातों पे चलना
  12. कृष्ण कहते हैं – इस दुनिया में जिन लोगों को अपने कर्मों का फल चाहिए होता है वो देवताओं का पूजन किया करते हैं, क्योंकि उन्हें कर्मों से पैदा होने वाली सिद्धि जल्दी मिल जाती है, जो लोग कृष्ण के कहे अनुसार कर्म करते हैं और साथ में देवताओं की पूजा करते हैं उन्हें उनके कर्मों के फल जल्दी मिल जाते हैं – सच्चे मन से सिर्फ कर्म करना, कर्म करते हुए सिर्फ फल की ही नहीं देवता और ईश्वर को भी याद रखना, ऐसा करने पर फल जल्दी मिलता है – कर्म किया है तोह फल तोह आएगा ही, चाहे अच्छा या बुरा – लेकिन अगर कर्म करते हुए मैन में भगवान है तोह फल अवश्य अच्छा और जल्द आएगा
  13. याहं कृष्ण हमारे समाज की सबसे बड़ी सच्चाई जो हम भूल चुके हैं, उसके बारे में बता रहे हैं, ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन 4 वर्णों के समूह गुण और कर्मों के विभाग पूर्वक मेरे द्वारा रचा गया है – इस प्रकार इस सृष्टि रचनादि कर्म का करता होने पर भी, मुझ अविनाशी परमेश्वर को तू वास्तव में अकर्ता ही जा – जिसे हम जात या जाति कहते हैं वो आपके गुण और कर्मों पे निर्भर करती है, आपके जन्म पर नहीं – हो सकता है आपका जन्म अच्छे घर मे हुआ हो, आपके माता पिता अच्छे इंसान हो, आपकेके माता पिता अच्छे कर्म करते हो , लेकिन अगर आप धूर्त है, झूठ बोलते हैं या गलत काम करते हैं तोह क्या आपको भी सच्चा और अच्छा कहा जाएगा ? ना कभी नहीं
  14. कर्म करना है लेकिन उसमें बंधना नहीं है, कर्म को पूरी लगन से अपना कर्तव्य समझकर आपको करना है, लेकेइन उसमें बंधकर, उसके फल के लिए परेशान नहीं होना है – आपने परीक्षा दी, या किसी चुनौती का सामना किया, अब उसके result का आपको इंतज़ार है और आप सोच रहे हैं कि न जाने क्या होगा, हके भगवान, अच्छा कर देना, ये गलत है, सच्चे मन से कर्म करिये और आगे बढ़ते रहिये, भगवान से ये मत कहिये की वो सब अच्छा करें, आप अपना कर्म अच्छा करिये उसके बाद उस पर छोड़ दीजिए, भगवान को अच्छा फल देने के लिए कभी मत कहिये, उससे कुछ नहीं होगा
  15. कृष्ण आगे अर्जुन को बताते हैं, के बीते समय में जितने लोगों को मोक्ष प्राप्त हुआ था, उन्होंने इसी तरीके का इस्तेमाल किया था, और इस समय में अगर अर्जुन तुझे भी मोक्ष की इच्छा है, तोह तुझे भी इसी तरीके से चलना पड़ेगा – कृष्ण पूर्वजों के तरीकों को समझते हुए अर्जुन से कह रहे हैं के उससे पहले भी कितने ही लोग निष्काम कर्म को समझ ईश्वर को प्राप्त हुए थे उसी तरह अर्जुन को भी इस बने बनाए तरीके पे चल ईश्वर को पाना चाहिए – दुनिया कितनी भी बदल जाये, दुनिया के नियम नहीं बदलते , जैसे जन्म और मृत्यु अटल है ,उसी तरह से मेहनत करने पर अच्छा फल मिलेगा ये भी अटल है
  16. confusion की स्तिथि को दूर करते हुए भगवान श्री कृष्ण कहते हैं – कर्म क्या है, और अकर्म क्या है – इस प्रकार इसका निर्णय करने में बुद्धिमान पुरुह भी मोहित हो जाते हैं – इसीलिए वो कर्म तत्व मैं तुझे भली भांति समझा कर कहूंगा – जिसे जानकर तू अशुभ से अर्थात कर्म बंधन से मुक्त हो जाएगा – आखिर कर्म होता क्या है? कुछ भी करने को क्या कर्म कहते हैं? हर समय हम इस शब्द का इस्तेमाल करते हैं – परंतु कृष्ण कर्म और अकर्म का भेद खोलेंगे और समझाऐंगे की कैसे इसको समझकर आप कर्म योग में लग सकते हैं और अपने जीवन में आगे बढ़ सकते हैं
  17. कर्म क्या है ये समझना चाहिए और अकर्म क्या है ये भी समझना चाहिए और साथ में विकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए, क्योंकि कर्म बोहोत ही complicated चीज़ है – 3 शब्दों में कहा है कृष्ण ने – कर्म, अकर्म और विकर्म यानी कुछ करना, कुछ ना करना और कुछ विशेष करना – इन बातों अगर हम समझ जाएंगे तोह इस practical दुनिया में हमारा जीना आसान हो जाएगा
  18. जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता है या अकर्म में कर्म देखता है, वो और लोगों से ज़्यादा intellegent है , और ऐसा योगी समस्त कर्मों को करने वाला है – कर्म में अकर्म देखने का मतलब क्या हुआ? – यानी जो मनुष्य कर्म करता है लेकिन उसपर घमंड नहीं करता के करने वाला वो खुद है – वो कर्म में अकर्म को देख रहा है – कर्म को कर्तव्य मान के कर रहा है – लेकिन दुनिया जहान में या खुद अपने आप से इसका डंका नहीं पीटना चाहिए दोस्तों – उसे ज़बरदस्ती बताना नहीं चाहिए कि मैंने ये कर दिया या वो कर दिया – अपना काम करना है उसके फल के बारे में नहीं सोचना है – और अपना काम, अगले कर्तव्य में लग जाना है – यही है कर्म में अकर्म को देखना
  19. कृष्ण कर्म को आगे समझाते हुए कहते हैं, जिसके शास्त्रों द्वारा ठीक बताये गए कर्म बिना कामना और संकल्प के होते हैं – तथा जिसके सारे कर्म ज्ञान रूप अग्नि द्वारा भस्म हो गए हैं, उस महापुरुष को ज्ञानी जन भी पंडित कहते हैं – सीधी भाषा में इसे यूँ समझिये – कर्म करना है और उसे भूल जाना है – लेकिन कौनसा कर्म – शास्त्र सम्मत – जिस कर्म को शास्त्र ठीक बताएं – शास्त्र उस कर्म को ठीक बताते हैं, जिसमें धर्म का पालन है, जिसमें आपका कर्तव्य, आपकी responsibility पूरी होती है, किसी भी काम को अपने स्वार्थ के चलते आप अच्छा या बुरा कह सकते हैं, लेकिन सही कर्म वही है जो शास्त्र सम्मत है
  20. जो पुरुष सारे कर्मों और उनके फल में आसत्ति को छोड़ करके इस दुनिया पर dependent नहीं और परमात्मा में नित् तृप्त है – वह कर्मों को करता हुआ भी वास्तव में कुछ नहीं करता – जो इंसान काम करते हुए उसके फल के बारे में बिल्कुल नहीं सोचता, वोही सबसे आगे जाता है – उसी की उन्नति होती है, इतनी उन्नति, इतनी progress की अगर वो चाहे तोह भगवान को भी पा सकता है – कर्म करते हुए उसके फल, result में आसत्ति नहीं रखनी चाहिए – मत सोचिये की आगे क्या होगा, बस अभी में रहिये और अपना काम करिये
  21. इस श्लोक में श्री कृष्ण योगी की developed अवस्था के बारे में बता रहे हैं – जिसने अपने अंतःकरण यानी मैन और इन्द्रियों के साथ अपने शरीर को जीत लिया है – जिसने अपने मन और इन्द्रियों को अपने काबू में कर लिया है – ऐसे पुरूष को आशा रहित पुरुष कहा जाता है – आपका मन अंतःकरण आपमें कल्पनाएं जगाता है, आशाएं जगाता है, तब आप उसके काबू में होते हैं – जो आपका मन कहता है, आप वही करते हैं, और आप अपनी आशाओं के वश में होते हैं, लेकिन जो अपने मन पर विजय पा लेता है, वो सिर्फ शरीर संबंधी कर्म करता है – वो कर्म करता है और नहीं भी करता
  22. जिसको बिना मांगे जो मिले वो उसी में संतुष्ट रहे, और जिसे दूसरों से जलन नहीं होती, जओ सुख दुख आदि द्वान्दुओं से छूट चुका है – ऐसा सिद्धि और असिद्धि में बराबर रहने वाला कर्म योगी, कर्म करता हुआ भी उनसे नहीं बंधता – कर्म योगी की definition कृष्ण बता रहे हैं कि योगी को जो भी बिना इच्छा के मिल जाता है वो उसी में संतुष्ट रहता है – जो किसी से जलन नहीं रखता के उसके पास मेरे से ज़्यादा पैसा या शोहरत या नाम है, जो हर या जीत, सुख या दुख इन सबमे एक जैसा महसूस करता है, वही असली कर्म योगी है
  23. कर्म योगी अपनी इच्छाओं पे विजय पा अपने लगाव को खत्म करता है – उसे अपनी देह पर भी घमंड नहीं रहता – कि मैं इतना ताकतवर या सुंदर हूँ – वो अपने मन में ममता या मोह को नहीं आने देता – ऐसे योगियों के मन में सिर्फ परमात्मा का ज्ञान होता है, उसी ज्ञान पे चलते हुए वे अपना कर्म यज्ञ की तरह करते हैं – और इतना कठोर नियंत्रण होने के कारण ही ये लोग मोक्ष को समझ उसको प्राप्त करते हैं – ऐसा करना आसान नहीं होता लेकिन असंभव भी नहीं है – यही बात कृष्ण बात रहे हैं कि कई लोग इस अवस्था को प्राप्त हो चुके हैं- कर्म योगी बन चुके हैं
  24. कृष्ण कहते हैं – जिसे यज्ञ में चढ़ाया जाए वो ब्रम्ह है और हवन करने के लिए जो द्रव्य इस्तेमाल में लाया जाए वो भी ब्रम्ह है साथ में जो हवन की आग में आहुति दी जाए वो भी ब्रम्ह है – ऐसे हवन को करने वाला योगी जो फल पाता है वो भी ब्रम्ह है – ब्रम्ह से यहां मतलब है – सबसे बड़ा सत्य – चारों तरफ जो दुनिया आप देखते हैं वो इसी सच का एक रूप है – कृष्ण की इन बातों से ब्रम्ह को समझने की कोशिश करिये
  25. कुछ योगी देवताओं को सब कुछ मान यज्ञ को उनको समर्पित करते हैं – देवता का अर्थ है जिन भागवान के रूपों की हम पूजा करते हैं – यही यज्ञ का एक रूप होता है – जो हमारे जैसे लोगों के लिए है – जो पहुंचे हुए कर्म योगी होते हैं – वो यज्ञ में अपना सब कुछ ब्रम्ह को सौंपते हैं, उनका हर अनुष्ठान ब्रम्ह के लिए होता है – चाहे आप राम, कृष्ण, शिव या दुर्गा या अपने किसी अभीष्ट को याद करके यज्ञ करें या ब्रम्ह को सबसे बड़ा सच मानके कर्म करें – कोई फर्क नहीं पड़ता – बस आपको ये ध्यान रखना है कि आपका कर्म भी एक यज्ञ है जिसमें आप उस ईश्वर को अपना सब कुछ सौंप के बस काम में लग जाते हैं
  26. आग में कुछ भी डालो वो जल के भस्म हो जाता है, सैयाम को भी कृष्ण एक अग्नि बता रहे हैं – जो योगी होते हैं वो अपनी सैयाम की आग में अपनी इन्द्रियों को डालते हैं, और उन इन्द्रियों को यानी अपनी इच्छाओं को भस्म कर देते हैं, जला देते हैं, परंतु जो योगी नहीं होते, नादान होते हैं वो ठीक उसका उल्टा करते हैं – वो अपना सब कुछ इन इन्द्रियों में भस्म कर देते हैं – किसी ने कुछ कहा जिससे आपको गुस्सा आ गया या किसी को देख आपके मन में जलन हुई – कि उसकी कार मेरी कार से बड़ी कैसे वगैरह वगैरह – बस इसी तरह की बातों में नादान लोग खुद को जला डालते हैं
  27. अपनी इन्द्रियों को, अंतःकरण को वश में करने का सबसे बड़ा तरीका है ज्ञान – ज्ञान से ही योगी लोग अपने मन को नियंत्रण में लाते हैं – जब भी कोई बुरा विचार आता है तोह उस समय उनका ज्ञान ही उन्हें बताता है कि उनके जीवन का लक्ष्य ये नहीं कुछ और है – आप खुद सोचिये, हर काम के दो पहलू होते हैं – उसे करते हुए आपको पता होता है कि क्या सही तरीका और क्या गलत – तब आप कौनसा रास्ता चुनते हैं – ये ज्ञान ही तोह है जो आपको सही रास्ता चुनने के लिए कहता है – कृष्ण हमें गीता के माध्यम से यही ज्ञान दे रहे हैं
  28. हर किसी का युद्ध अलग है – इसीलिए हर किसी का यज्ञ और हर किसी का कर्म भी यज्ञ है – यही बात कृष्ण इस श्लोक के द्वारा हमें बता रहे हैं – कई पृरुष द्रव्य संबंधी यज्ञ करने वाले होते हैं – कितने ही तपस्या रूप यज्ञ करते हैं – तथा दूसरे कितने हो योग रूप यज्ञ करते हैं, कोई ईश्वर की पूजा कर उसे फूल और फल चढ़ाता है, कोई तपस्या कर भगवान को खुश करने की कोशिश करता है, और कोई योग से भगवान को पाने की कोशिश करता है – कृष्ण कहना चाहते हैं अपना युद्ध पहचानिए और अपना कर्म चुनिए
  29. इस श्लोक में कृष्ण प्राणायाम से जुड़े आयाम बता रहे हैं – कितने ही योगी जन अपान वायु मे प्राण वायु को हवन करते हैं – वैसे ही अन्य योगी जन प्राण वायु में अपान वायु को हवन करते हैं – तथा अन्य कितने ही नियमित आहार करने वाले प्राणायाम परायण पृरुष प्राण और अपान की गति को रोक कर प्राणों को प्राणों में ही हवन किया करते हैं – ये सभी साधक यज्ञों द्वारा पापों का नाश कर देने वाले और यज्ञों को जानने वाले – प्राण का अर्थ है सांस अंदर खींचना, अपान का मतलब सांस बाहर छोड़ना – कौन कितना पहुंचा हुआ योगी है उसकी अलग अलग अवस्था होती है – बोहोत से योगी अपनी साँसों के आने जाने पर पूरा control रखते हैं – परंतु हम में से ज़्यादातर ऐसा नहीं कर पाते, हमारी सांसें तोह मजबीरी में चलती है, क्योंकि नही चली तोह हम मार जाएंगे – लेकिन योगियों के साथ ऐसा नहीं होता – प्राणायाम से हम अपने पर सैयाम करने में सफल होते हैं और यही बात कृष्ण हमें बता रहे हैं
  30. यज्ञ की महिमा का बखान करते हुए कृष्ण कहते हैं – है कुरुषेषत अर्जुन, यज्ञ से बचे हुए अमृत का अनुभव करने वाले योगी जन – सनातन पर ब्रम्ह परमात्मा को प्राप्त होते हैं – और यज्ञ ना करने वाले पुरूष के लिए तोह ये मनुष्य लोग भी सुख दायक नहीं हैं – फिर परलोक कैसे सुखदायक हो सकता है – यज्ञ करने के बाद जो बचता है – उसे कृष्ण अमृत बता रहे हैं और ये अमृत सीधे भगवान तक ले जाता है – दोस्तों यज्ञ को आप कर्म भी समझ सकते हैं – कर्म करने के बाद जो भी उसका फल हो उसको भगवान का आशीर्वाद समझ उसमें संतुष्ट होकर अपने अगले कर्म में लग जाना चाहिए
  31. कृष्ण आगे कहते हैं – कितने ही तरह के यज्ञ वेद की वाणी में बताए गए हैं – उन सबको तू मन, इन्द्रिय और शरीर की क्रिया द्वारा सम्पन्न होने वाले जान – इस प्रकार इन यज्ञों का मूल तत्व इनकी reality जान कर उनके अनिष्ठां द्वारा तू कर्म बंधन से हमेशा के लिए मुक्त हो जाएगा – कितने ही यज्ञ वेदों में बताए गए हैं – और कई यज्ञों के बारे में श्री कृष्ण ने भी बताया – जैसे अपने पर सैयाम रख इन्द्रियों को वश में करना, यज्ञ में देवताओं को अर्पण करना – साँसों को नियम में रख प्राणायाम करना, ये सारे यज्ञ ही तोह हैं – ये यज्ञ अगर हम सच्चे मन से करेंगे तोह इस जन्म और मृत्यु के चक्कर से हमेशा के लिए निकल सकते हैं
  32. हे परंतप अर्जुन, आहुति चढ़ा कर किये गए यज्ञ से अच्छा ज्ञान यज्ञ होता है, एक यज्ञ तोह वो होता है जिसमे जिसमे हवन में आप देवताओं का आवाहन कर उन्हें अलग अलग द्रव्य जैसे घी इत्यादि चढ़ाते हैं और एक दूसरा यज्ञ होता है ज्ञान यज्ञ जिसमें आप अपनी इन्द्रियों को वश में करते हैं, अपनी साँसों को नियंत्रण में रखते हैं, अकर्म करते लेकिन उसके फल में इच्छा नहीं रखते – ये सारे ज्ञान यज्ञ हैं – और ये द्रव्य यज्ञों से कहीं अच्छे हैं – इसीलिए ज्ञान यज्ञ हमें सीधे ईश्वर से साक्षात्कार करवाता है, हमें उनसे जोड़ता है
  33. अर्जुन तोह खुद भगवान के सामने था लेकिन हम सब तोह नहीं हैं दोस्तों, अगर ये ज्ञान हमें समझ नहीं आ रहा तोह हम तत्व दर्शी ज्ञानी महापुरुष के पास जाके इस ज्ञान को या ब्रम्ह को समझने की कोशिश कर सकते हैं – अगर ज्ञान हमें ज़रूरी ही नहीं लगेगा तोह हम बस अपनी ज़िन्दगी को बिना कुछ जाने जीते ही चले जायेंगे – कृष्ण अर्जुन के माध्यम से हम सबको कुछ बता रहे हैं – ज्ञान को तू तत्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाके समझ – उनको भली भांति दंडवत प्रणाम करने से उनकी सेवा करने से और कपट छोड़कर सरलता पूर्वक प्रश्न करने से वे परमात्मा के तत्व को भली भांति जानने वाले ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्व ज्ञान का उपदेश करेंगे
  34. हम सब अपना काम करते हैं, कामाते हैं, हमारा परिवार बढ़ता है, हम बूढ़े होते हैं और इस तरह से ये चक्कर निरंतर चलता रहता है, किन करते है हम ऐसा, क्या ज़रूरत है ऐसा करने की, कीन आये हैं इस दुनिया में हम? अज्ञानियों को इसके उत्तर की ज़रूरत नहीं पड़ती, आपके आस पास कितने लोग ये सवाल करते हैं, ज़याद नहीं लेकिन जिसमें थोड़ा सा भी ज्ञान है ना, वो ये जानना चाहता है और यही जानने के लिए हमें तत्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर के समझने की कोशिश करनी चाहिए, तभई तोह हम मोह से छूटेंगे और कि इस दुनिया को समझने की कोशिश भी करेंगे
  35. यदि तू अन्य सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है तोह भी तू ज्ञान रूपी नौका द्वारा निसन्देह सम्पूर्ण पाप समुद्र से भली भांति तर जाएगा – इसका मतलब ये नही की पहले पाप करिये, फिर ज्ञान हासिल करिये फिर बच जाइये – यहां कृष्ण ये कह रहे हैं कि आप इस doubt में मत रहिएगा की हम बोहोत बड़े पापी हैं, हमने तोह कभी यज्ञ या भगवान को कभी अच्छे से याद नहीं किया, तोह ज्ञान हासिल हम कभी कर ही नहीं सकते, हर कोई कर सकता है, जिसमें इच्छा है ज्ञान को हासिल करने की वो हर कोई कर सकता है, भगवान की असलियत जानने की वो भगवान पे सवार होकर बाकियों से कई आगे भी निकल सकता है – तोह देर किस बात की, आइये प्रारम्भ करें
  36. हे अर्जुन जैसे जलती हुई आग में ईंधन जल कर खत्म हो जाता है, वैसे ही ज्ञान रूप अग्नि हमारे सारे कर्मों को भस्म कर देती है – ईंधन को जब आप आग में डालते हैं तोह ईंधन बचता नहीं, सब आग बन जाता है, उसी तरह से जब ज्ञान आपको प्राप्त हो जाता है, जब आप ज्ञानी बन जाते हैं, तोह आपके कर्म भी खत्म हो जाते हैं – यहां पर कर्मों का खत्म होने का मतलब ये नहीं कि आप कर्म करना छोड़ देते हैं, इसका मतलब है कि आप कर्मों के बंधन से छूट जाते हैं – कर्म करते हैं, उसे कर्तव्य मान कर, न की उसके फल के लिए, यही तोह ज्ञान है, जिसे हम सबको जानना चाहिए
  37. ज्ञान हर किसी को शुद्ध कर देता है, कितने ही समय से कई लोगों ने कर्म योग के द्वारा, ऐसे ज्ञान को हासिल किया है, अगर मैन में इच्छा न हो, तोह आप काम नहीं करते, उसी तरह से अगर किसी के मन मे ज्ञान को समझमे की उसे जानने की जिज्ञासा नहीं है तोह उसे ज्ञान कैसे मिलेगा? मैन में ज्ञान के प्रति सवाल पैदा करके कर्मयोग से ज्ञान हासिल किया जा सकता है, ऐसा कृष्ण के रहे हैं, जिसका मन साफ है, ज्ञान की इच्छा है, और जो निष्काम कर्म करने के लिए तैयार है, वो ज्ञान हासिल कर सकता है
  38. इन्द्रियों को जीतने वाले, मेहनत करने वाले और श्रद्धा रखने वाले मनुष्य को ज्ञान प्राप्त होता है, तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना देरी के उसी समय ही उसे भगवान की परम शांति मिलती है, जब आप परीक्षा देने जाते हैं, और आपको सारे जवाब मालूम हैं तोह परीक्षा देने में कोई परेशानी नहीं होती – उसी तरह से जो इन्द्रियों की बस में करने की कोशिश कर रहा है, जिसके मन में ईश्वर के प्रति श्रद्धा है उसको इस दुनिया की सच्चाई समझने में या ज्ञान हासिल करने में ज़्यादा समय नहीं लगता – सही लगन और सही तरीके से आप दुनिया में कुछ भी हासिल कर सकते हैं
  39. जो सही गलत का फैसला नहीं कर सकता, जिसमें श्रद्धा नहीं, जिसके मन में शक है, ऐसा मनुष्य खत्म हो जाता है, ऐसे संशय युक्त मनुष्य के लिके न ये दुनिया है, ना वो दुनिया, और न ही सुख, जिसमें न सोचने समझने की शक्ति है, जिसमें न ईश्वर के लिए न इस दुनिया के लिए श्रद्धा है, तोह उसके जीवन का कोई मोल ही नहीं – ऐसे अज्ञानी बेवकूफ के लिए किसी दुनिया में आराम नहीं, और उसे सुख कभी नहीं मिलता – बिना कुछ किये कुछ भी हासिल नहीं होता और साथ में अगर कुछ करने की, कुछ जानने की इच्छा नहीं, तोह उस इंसान के होने में और न होने में कोई फर्क नहीं
  40. हे धनंजय, जिसने कर्म योग के तरीके से अपने सारे कर्मों को भगवान को चढ़ा दिया है – और जिसने विवेक के द्वारा अपने सारे शक खत्म कर दिए हैं, ऐसे मन को वश में किये हुए पृरुष को कर्म नहीं बांधते, कर्मयोगी वो होता है, जो अपना कर्म करता है, और उसे भगवान को सौंप देता है, जो अपने हर काम को बिना घमंड के करता है, अर्थात उस पर घमंड नहीं करता, जो अपनी समझ से अपनी मन में से शक दूर करता है – अगर शक में रहेंगे न तोह कभी कोई फैसला नहीं कर पाएंगे – और जो अपने मन पर विजय हासिल कर लेता है, उसे भगवान का ज्ञान जानने से कोई नहीं रोक सकता
  41. हे भरतवंशी अर्जुन इसलिए तू हृदय में स्थित इस अज्ञान से होने वाले अपने शक को विवेक रूपी तलवार से काटकर कर्मयोग में स्थित हो जा और युद्ध के लिए खड़ा हो जा – हमें भी अगर मन में कोई शक या चिंता सताए तोह बस कर्मयोग को ध्यान में रखकर काम में लग जाना चाहिए, ज़्यादा नहीं सोचना चाहिए कि अंजाम क्या होगा, काम करके उसे भगवान को सौंप देना चाहिए

अध्याय 5 – कर्म सन्यास योग

  1. अर्जुन बोले – हे कृष्ण, पहले तोह आप कर्मों के सन्यास की बात करते हैं और साथ ही साथ में कर्मयोग की तारीफ भी करते हैं – प्रभु आप सीधे सीधे जो मेरे लिए फायदेमंद है वो बताइये
  2. भगवान श्री कृष्ण कहते हैं – कर्म सन्यास और कर्म योग, ये दोनों ही फायदा पहुंचाने वाले हैं – लेकिन इन दोनों में कर्म योग साधन आसान होने की वजह से बेहतर है – दोनों रास्ते मंज़िल पर पहुंचाएंगे लेकिन एक रास्ता मुश्किल है, इसमें जगह जगह पर नदियां, नाले, पाहाड़ और खाइयां आएंगी, लेकिन दूसरा रास्ता इससे बोहोत आसान है, अउर ये रास्ता है कर्मयोग का – कर्मयोग वो रास्ता है जो हम में से हर कोई हर समय कर सकता है, इसके लिए कोई खास बड़ी तैयारी नहीं करनी होती, बस अपनी रोजमर्रा की ज़िंदगी को निष्ठा और कर्तव्य के साथ जीना होता है
  3. हे अर्जुन जो पृरुष न किसी से जलन रखता है और न किसी वस्तु को पाने की इच्छा रखता है ऐसे कर्मयोगी को सन्यासी समझना चाहिए क्योंकि ऐसे लोग जो मोह और क्रोध से छूट जाते हैं, ऐसे लोग संसार के बंधन से मुक्त हो जाते हैं – उन्हें या तोह कुछ पाने की इच्छा होती है जैसे धन, दौलत, या ऐसी हालत जिससे आप नफरत करते हैं और निकलना भी चाहते हैं, जब इस तरह के दुनिया के बंधन में फंसे होते हैं तोह और कुछ नहीं कर पाते, बस फंसते ही चले जाते हैं, लेकिन जैसा कृष्ण कह रहे हैं, अगर आप दोनों को छोड़ सकें, न ही इच्छा हो और ना ही किसी के लिए नफ़रत, तोह आप ऐसे कर्मयोगी हैं, जिसको सच्चा सन्यासी माना जायेगा
  4. कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि सन्यास और कर्मयोग से अलग अलग फल मिलता है, कृष्ण ऐसे लोगों को मूर्ख बता रहे हैं, दोनों दो अलग रास्ते हैं, दोनों की destination है वो परमात्मा, जिसमें हमें एक दिन मिल जाना है, सन्यासी उसे मत मानिए जो गेरुए कपड़े में दुनिया को छोड़ भिक्षा मांग के जिंदा रहता है, असली सन्यासी वो है जिसने अपनी feelings पर विजय पाई है, जो अच्छे और बुरे को एक जैसा समझता है, और कई ऐसे हैं जो कर्मयोग में रहकर भगवान को पाना चाहते हैं – वो भी गलत नहीं है, आपको अपना रास्ता स्वयं चुनना है।
  5. परम धाम यानी सदगति, final destination ज्ञान योगियों को भी प्राप्त होता है और कर्म योगियों को भी, इसीलये समझदार को ज्ञान योग और कर्म योग को एक जैसा ही समझना चाहिए – कृष्ण ये बात उनके लिए कह रहे हैं जो जगह जगह ज्ञान दिए फिरते हैं, भगवान की पूजा करो, पूजा करो और कोई काम मत करो – ये पाखंड है दोस्तों – जैसे ज्ञान योग एक रास्ता है, वैसे ही कर्मयोग से भी आप मंज़िल को पा सकते हैं – इसमें ध्यान देने की बात ये है कि कृष्ण कभी भी परिवार को छोड़ने की या अपने कर्तव्य को छोड़ने की बात नहीं करते
  6. कृष्ण अर्जुन को कर्मयोग की अहमियत समझाते हुए कहते हैं – सन्यास का अर्थ है, अगर ज्ञान योग में भी कर्म योग का सहारा लोगे, तभी तुम दुनिया के पछड़ों से ऊपर उठके और सच्चाई को जान पाओगे, और अगर तुम्हें सच्चाई को जानना है तोह अपने आप को कर्तापन यानी कि अहंकार – जैसे कि मैं हूँ, मैइन ही करता हूँ, इसे छोड़ना होगा, और इसे कैसे छोड़ा जाए? अपनी इन्द्रियों को वश में करके, फल की इच्छा को पूरी तरह से त्याग करके, कर्म को करके उसे भगवान को सौंप के अहंकार छोड़ा जा सकता है, अगर आपने ज्ञान योग का सहारा लिया, तब भी ये कर्मयोग तोह आपको करना ही होगा, तोह फिर सीधे कर्मयोग ही क्यों न किया जाए
  7. यदि नदी के पानी को आप चाहे घड़े में भर लें, वो रहेगा तोह पानी ही, ऐसे ही हम भी उस परमात्मा में से निकले हैं, उसका अंश है हमारी आत्मा – बस इसी को हमें समझना है – और वो कैसे होगा, इसका उत्तर हमें कृष्ण देते हैं – के जिसका मन उसके वश में है, जिसने इन्द्रियों को जीता है और जो अंदर से एकदम शुद्ध है, ऐसा कर्म योगी कर्म करता हुआ भी, कर्मों के चक्कर में नहीं पड़ता, और जब कोई इस अवस्था में आ जाता है, तब उसका सामना होता है उसकी अपनी आत्मा से – दुनिया का सबसे बड़ा सच यही है, और इसी को जानने के ही ये सारा खेल है, और यही बात कृष्ण अलग अलग तरीके से समझा रहे हैं
  8. जो सच्चाई को जान चुका है, जिसे ज्ञान प्राप्त है, वो सांख्य योगी देखता है, सुनता है, स्पार्ष करता है, सूंघता है, खाना खाता है, सोता है, सांस लेता है, बोलता है, सब कुछ करता है, जो मैं और आप करते हैं। लेकिन उस ज्ञानी और हम सबमें एक बोहोत बड़ा फर्क है, वो ये के सब कुछ करते हुए भी, वो जान रहा है के वो ये नहीं, कोई और कर रहा है, वो खुद को इस सब को करने वाला नहीं मानता, वो इस सब के पीछे ईश्वर को मानता है, अपना हर कर्म वो भगवान को सौंप देता है, हम ये समझते हैं, की हम अपनी दुनिया को चलाने वाले स्वयं हैं, परंतु यही फर्क है, हम में और ज्ञानी में
  9. कमल के फूल को ध्यान से देखिएगा, वो होता कीचड़ में है, उसपे पानी हमेशा आता जाता रहता है, लेकिन उसका पत्ता हमेशा सूखा ही मिलेगा, कीचड़ में रहकर भी, वो उसमें लिप्त नहीं होता, यही समझदार की निशानी है, ऐसे ही इंसान को ज्ञानी कहते हैं, जो इस दुनिया में रहे, आपने सारे कर्म, कार्तव्य निभाए लेकिन उसमें लिप्त ना हो – इनके चक्करों में न फसे, ज़िम्मेदारियों से आप बच नहीं सकते, उनसे भागना कायरता होती है, ज़िम्मेदारियाँ तोह हमें निभानी हैं, दुनिया के सारे काम करने ही पड़ेंगे लेकिन ये काम ऐसे करने हैं जिसमें हम फंस न जाएं, जैसा कि कृष्ण बता रहे हैं
  10. कर्म योगी आखिर क्या होते हैं? ज़रा उन्हें समझने की कोशिश कीजिये, योगी अपने शरीर, मन, बुद्धि, या इनद्रियों से कर्म करते हैं, लेकिन अपने अंदर से वो भगवान को समर्पित करते रहते हैं, बाहर से देख के ऐसा लगता है, के ये तोह सब कुछ हमारे जैसे ही कर रहे हैं, हमारे जैसे ही परिवार हैं, नौकर हैं, नौकरी है, सअब कुछ तोह normal है, लेकिन ऐसा सिर्फ दिखता है, योगी अंदर से एकदम शांत और गंभीर होता है, क्योंकि वो अंदर की आत्मा और परमात्मा का संबंध जान चुका है – इसके बावजूद वो सारे कर्म करता है
  11. कर्मयोगी को और समझाते हुए कृष्ण कह रहे हैं की कर्मयोगी कर्मों के फल का त्याग कर देता है, और इस त्याग के वजह से ही वो भगवान को हासिल कर पाता है, और वहीं दूसरी तरफ जो कर्मयोगी नहीं है, जैसे कि हम जैसे ज़्यादातर लोग, हमारे जैसे लोग कर्म की फल की ही इच्छा करते हैं, और बस इसी लिए उसमें बंधे चले जाते हैं, और कभी भी इस दुनिया के झमेलों से छूट ही नहीं पाते, देखा जाए तोह एक बोहोत छोटा सा फर्क है इसमें – कर्म दोनों कर रहे हैं, बस फल से एक का लेना देना नहीं है और एक का बिल्कुल है, लेकिन इस छोटे से फर्क का नतीजा बोहोत बड़ा होता है
  12. हमारा शरीर एक घर है, जिसे 9 द्वारों वाला माना गया है, जैसे 2 आंखें, 2 कान, 2 नाक के छेद और इत्यादि – इन्ही 9 द्वारों के ज़रिए हम बाहर की दुनिया से deal करते हैं, दुनिया का कोई भी काम बिना इन 9 द्वारों के possible नहीं है, ईसी घर में रहता हुआ, सांख्ययोग वाला सन्यासी, देखने में तोह हम सब के जैसे सारे काम कर रहा है, लेकिन अंदर से वो एकदम अलग है, उसके अंदर का सब कुछ भगवान से जुड़ चुका है, और इसीलिए वो असल में कुछ नहीं कर रहा, वो कर्म में अकर्म को समझ चुका है, खुद को बस जैसे एक माध्यम मान के वो परमात्मा का काम कर रहा है
  13. आदमी का एक होता है स्वभाव, और एक होती है प्रकृति, प्रकृति का जैसा असर आपके स्वभाव पर पड़ता है, आप वैसे ही बर्ताव करते हैं, परमेश्वर ना तोह आपके कर्तापन की, न कर्मों की, ओर न कर्मफल के साइयोग की रचना करता है, ईन सब का साइयोग आप सब के स्वभाव के वजह से होता है, आपका स्वभाव विकृत है या विकसित है, इसपर ही depend करता है कि आप क्या करेंगे, आपके करने पर कौनसा कर्म होगा, और उस कर्म के अनुसार आपको कौनसा फल मिलेगा, इस सब के लिए खुद को ही जिम्मेदार मानिए, ऐसा मत सोचियेगा, की मैनें तोह मेहनत की थी लेकिन भगवान ने ही फल नहीं दिया
  14. सब कुछ हमारे अंदर है, बस उसे हमारे सामने लाने की देरी भर होती है, भगवान ना किसी के पाप कर्म को और ना किसी के शुभ कर्म को ग्रहण करते हैं, पाप हो या पुण्य, ये तोह आपके ही हैं, तोह भगवान का इसमें क्या लेना देना, आप अपने स्वभाव, अपने nature के चलते जिस तरह के कर्म करते हैं, उसका नतीजा ही पाप या पुण्य होता है, आपके खुद के अंदर ज्ञान है, लेकिन वो अज्ञान के द्वारा ढका हुआ है, उसी के चलते सारे बुरे काम होते हैं, अगर आप उसे पहचान जाएंगे तोह सिर्फ अच्छा ही अच्छा होगा
  15. जब अंधेरा होता है, तोह कुछ नहीं दिखता और प्रकाश होते ही सब कुछ प्रकट हो जाता है, इसी तरह हमारे अंदर के अज्ञान के साथ भी होता है, जैसे ही हमें परमात्मा की सच्चाई समझ में आती है, जैसे ही हम ये समझते हैं, की हमारे अंदर की आत्मा उसी परमात्मा की अंश है, वैसे ही एकदम से उजाला होता है, ये उजाला एक नए सूरज के उदय के समान होता है – हम अपने आप को सबसे बड़ा ज्ञानी मानते हैं, हम सोचते हैं कि हमें सब पता है, वो गलत है, अरे सबसे पहले ये स्वीकार करिये के हमें कुछ नहीं पता – तभी रास्ता खुलेगा, ज्ञान के आने का, वरना हमेशा ही अज्ञानी रहेंगे
  16. ज्ञान की बातें हो सकती हैं कि हमें boring लगे, philosophy या बकवास लगे, ये तोह बस सोच है, दुनिया की सबसे बड़ी सच को अगर कोई boring समझना चाहता है तोह उसे कोई क्या कह सकता है, कृष्ण कहते हैं कि जिसका मैन भगवान के कहे अनुसार चलता है, जिसकी बुद्धि उसे सही राह पे ले जाती है, जिसका ध्यान हमेशा उस परमात्मा में लगा रहता है, ऐसे लोग एक दिन कर्म के बंधन से, जन्म के बंधन से मुक्त होकर उसी परमात्मा में मिल जाते हैं, और इसे ही परमगति कहते हैं – ये कुछ गिने चुने लोगों को ही मिल पाती है – क्या आप उनमें से एक हैं
  17. समदर्शिता यानी कि समान भाव रखना, जो पंडित और चांडाल को या गाय और कुत्ते को, गाय या हाथी को एक भाव से देख सकता है, उसे ही खुद को ज्ञानी कहलाने का अधिकार है, ज्ञान सबसे पहले हमारे अंदर के भेद भाव को खत्म करता है, चारों तरफ यही भेदभाव तोह हमें दिखता है, हज़ारों साल पहले जो कृष्ण ने कहा, उस पर आज भी लोग चलने को तैयार नहीं हैं, अगर ज्ञान हासिल करना है तोह अपने अंदर सम्भाव पैदा करना चाहिए – अज्ञान या अहंकार में किसी को छोटा या बड़ा समझना बेवकूफी है
  18. कृष्ण के रहे हैं, के जिसके मन में सम्भाव आ गया, उसने जीते जी ही इस दुनिया को जीत लिया, जिस दुनिया में हम रहते हैं ना उसमें ज़्यादा पैसा, बड़ा घर, बड़ा नाम – शायद इसी को जीत माना जाता है, लेकिन कृष्ण ऐसा नहीं मानते, उनके हिसाब से दुनिया को वही जीत सकता है जिसने अपने मन को जीता – मैन के जीतने पर ही सम्भाव की situation आ सकती है – वो पैसा किस काम का जो आपके मन में लोगों के प्रति भेद भाव को खत्म नहीं कर सकता, इसी लिए सम्भाव ही ब्रम्ह की स्तिथि होती है
  19. जो पुरुष अच्छा होने पर खुश न हो, बुरा होने पर परेशान ना हो, उसे ही स्थिर बुद्धि और संशय रहित माना जा सकता है, स्थिर बुद्धि का मतलब हुआ जिसकी बुद्धि स्थिर है, कठिन हालात में जब फैसला लेना पड़ता है, उस समय आपकी बुद्धि अगर स्थिर होगी, तोह फैसला जल्दी और सही लिया जाएगा, और अगर विचलित होगो तोह यहां वहां भागेगी – तोह फैसला भी देरी से और गलत आएगा – स्थिर बुद्धि ही आपके मन के संशय और शक को दूर करती है, याउर तभी आप बनते हैं, संशय रहित यानी doubtless – दोस्तों मन से शंका अगर दूर हो जाए तोह निश्चय की स्तिथि आती है
  20. धन, धान्य, खाना, अपनों का प्यार, महँगी चीज़ें, ये सब बोहोत ही आनंद देती हैं, दुनिया की चीज़ों का मज़ा ही कुछ अलग है, इसी लिए तोह हम हमेशा इन बाहरी चीजों को हासिल करने में लगे रहते हैं, अब अगर आपको ये बताया जाए कि कुछ ऐसा भी है, जो इन सब से सैकड़ों हज़ारों गुना आनंद दायक है, तोह दोस्तों क्या आप उसे हासिल करने की कोशिश करेंगे? जी हाँ, भगवान कृष्ण की भगवद गीता वही बता रही है, बहार की चीज़ों से ज़्यादा जिसे अपने अंदर की बातों से आनंद आता है, सच्चा ज्ञानी वोही है, उसी ज्ञानी को ऐसे आनंद का अनुभव हो सकता है जिसके बारे में हम और आप सोच भी नहीं सकते
  21. आंखें देखती हैं, कान सुनते हैं, जीभ स्वाद बताती है, त्वचा स्पर्श करती है, इन्ही इन्द्रियों और उनके विषयों के भोग से हमें आनंद की प्राप्ति होती है, इन्ही सब से हमें सुख मिलता है – एकदम गलत – हम ऐसा सोच, समझ रहे हैं कि इन इन्द्रियों के भोग से हमें सुख मिल रहा है – ना – कृष्ण बात रहे हैं कि असल में इन सब इन्द्रियों का भोग ही हमारे सारे दुखों का कारण है, इसको test करने का भी एक simple test, कृष्ण बताते हैं, कुछ अच्छा खाने का स्वाद तब तक है जब तक आप खा रहे हैं, कुछ अच्छा सुनना भी थोड़ी देर तक ही आनंद देता है, इसलिए दोस्तों इन्द्रियों के सारे आनंद नाशवान हैं, यानी के खत्म हो जाते हैं, इसीलिए ज्ञानी पुरुष इन इन्द्रियों के सुखों में नहीं फंसते
  22. हम में से जो भी हमारे मरने से पव्हले, इस शरीर के नाश होने से पहले ही अपने काम क्रोध को नियंत्रण में रखने में समर्थ हो जाता है वही पुरुष योगी है और वही सुखी भी है – कृष्ण कहना चाहते हैं कि समय थोड़ा सा है, समय पूरा होने के बाद तोह मर ही जाना है, उसके बाद फिर कोई दूसरी योनि मिलेगी, शयाद कुत्ते की, पक्षी की, गधे की, घोडे की – किसको पता, तोह मरने से पहले ही अगर आपने मन पर विजय पा लोगे, अपने काम क्रोध से पैदा होने वाले भावों को संभाल लोगे तोह तुम्हारा भला हो जाएगा, वरना जन्म और मृत्यु का चक्कर लगा ही रहेगा, लगा ही रहेगा
  23. जो बाहर के सुखों को छोड़ और इन्द्रियों के आनंद से बाहर निकलकर अपने अंदर झांकता है, जओ अपने अंदर की आत्मा को पहचानकर उसमें ही खुश रहता है, जो अपनी आत्मा की सच्चाई में ही ज्ञान ढूंढता है, भगवान कृष्ण उसे ज्ञानी मानते हैं, बाकी तोह बस हैं, अजर अगर वो भी नही होंगे तो कुछ फर्क नहीं पड़ेगा – कृष्ण कहते हैं कि ऐसे ज्ञानी ही ब्रम्ह को प्राप्त होते हैं – लेकिन इन सब बातों का ये मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि सब कुछ छोड़ के सन्यास लेना है, अरे कर्म तोह करना ही है भाई, उसके बिना कुछ रास्ता ही नहीं
  24. जिनके सारे पाप खत्म हो चुके हैं, जिनके सब शक ज्ञान द्वारा मिट चुके हैं, जओ सम्पूर्ण प्राणियों के हित में लगे रहते हैं, और जिनका जीता हुआ मन अपना काम करते हुए भी परमात्मा में स्थित होता है वे पुरुष ही शांत ब्रम्ह को प्राप्त होते हैं, जैसे लालच में कभी शांति नहीं मिलती, शन्ति मिलती है संतोष में, उस तरह से बाहर की चीज़ों में जो आनंद है वो झूठा है, असलि आनंद आपके अंदर है, अपने अंदर, मन में, दूसरों की भलाई में, जो इस तरह से अपने आप पर विजय पा लेता है, और इन बातों के कहे अनुसार चलता है, उसी को अंत में ब्रम्ह की प्राप्ति होती है
  25. दोस्तों ज्ञान की शुरुवात होती है मन पर विजय पाने के साथ, लेकिन मन को कैसे जीत जाए – अपनी भावनाओं को control करके – जब भी आप बेहद ज़्यादा गुस्सा होते हैं तोह आपको पता लगता है, बोहोत ज़्यादा प्यार में होते हैं तब भी पता लगता है, बस इसी आती को रोकना है, याही वो भावनाएं हैं जिनको नियंत्रण में लाना है, काआम क्रोध पर तभी विजय पा पाएंगे, जब मन में प्रण करेंगे कि विजय पानी ही है, सोचेंगे ही नहीं तोह कभी कुछ होगा ही नहीं, आउर जिसदिन ऐसा हो गया तोह सोच लीजिये आपके अज्ञान अपर से पर्दा हट रहा है, और आप ब्रम्ह के पास हो रहे हैं
  26. दुनियादारी को भूल, बाहर के विषय भोगों को छोड़के, आँखों की दृष्टी को माथे के बीच में स्थित करके अपनी सांस पर ध्यान दीजिए इसे ही प्राणायाम कहते हैं, ये एक माध्यम है ध्यान में जाने का, अपनी इन्द्रियों को वश में करने का, ज़िंदा रहने के लिए अपने आप सांसें तोह सबकी चलती हैं, अपने को औरों से अलग करिये दोस्तों, अपनी आती और जाति हुई साँसों को नियंत्रण में करिये, तभी आप अपनी इन्द्रियों, मन और बुद्धि को जीत पाएंगे, तभी आप इच्छा, क्रोध और भय से छूट पाएंगे, और इसी से ही आपको मुक्ति मिलेगी
  27. अपने कहे पर चलने वाले को कृष्ण अपना भक्त मानते हैं जो उन्हें बोहोत प्रिय है, वो कहते हैं की जो यज्ञ करता है ओर जो sacrifice करके मेरे कहे अपर चलता है, आपने कर्तव्यों का सच्चे मन से पालन करता है, वो एक दिन मुझे ही प्राप्त होता है, और मैं उसे प्राप्त होता हूँ – कृष्ण को आप भगवान भी मान सकते हैं, या फिर आप उन्हें शांति भी मान सकते हैं, उनके कहे पे हो सकता है कि आपको भगवान मिले, या हो सकता है आपको शांति मिले, याउर इन दोनों अवस्थाओं में कोई फर्क नहीं है, जिस दिन भगवान की सच्चाई मिल जाती है, उससे बड़ी शांति और कोई हो ही नहीं सकती

ये था अध्याय 5 – इसमें कृष्ण ने अर्जुन की दुविधा को दूर करते हुए बताया, के सन्यास योग और कर्मयोग, दोनों ही रास्ते भगवान की ओर ले जाते हैं, लेकिन कर्म योग कुछ विशेष है, इस दुनिया और उस दुनिया के बीच की कड़ी है ये – भागवद गीता

अध्याय 6 – आत्म संयम योग

हमारे कितने ही जन्म हो चुके हैं ये हम नहीं जानते लेकिन ये जानते हैं के इस जन्म में हम में इतनी समझ है कि अगर हम चाहें तोह इस जन्म में भागवद गीता को सुन के, समझ के ज्ञान हासिल कर सकते हैं

  1. भगवान श्री कृष्ण कहते हैं – जो पुरुष कर्म के फल की इच्छा न करके सिर्फ करने योग्य कर्म करता है, यानी अपने कर्तव्य को निभाता है, वही असली सन्यासी और योगी है, असली सन्यासी और योगी वो नहीं जो दुनिया को छोड़ के ये कहता है के दुनिया के काम उसके लिए नहीं है, असली योगी वो है जो अपना निर्धारित कर्म, अपना कर्तव्य निभाता है – बस ध्यान इस बात का रखना है कि कर्म के फल की आशा या इच्छा नहीं करनी है – फल की इच्छा करी तोह वो स्वार्थ हो जाएगा – फल पर अधिकार नहीं, सिर्फ कर्म पर अधिकार है
  2. हे अर्जुन, जिसको सन्यास कहते हैं, उसी को तू योग जान, सन्यास यानी कि कामनाओं का त्याग, अपनी कामनाओं, इच्छाओं को तोह छोड़ना ही पड़ता है, तभी उस सन्यास को योग कहा जायेगा, लेकिन इच्छा को छोड़ देने का मतलब कर्म को छोड़ देना बिल्कुल भी नहीं है, ऐसे सन्यासी योगी नहीं माने जा सकते, कर्म तोह करना ही पड़ेगा चाहे कुछ भी हो जाये, कर्म करते हुए जो त्याग करता है, कर्म के फल में जो जी नहीं लगाता, उसे ही योगी कहा जा सकता है
  3. योगी सिर्फ वो ही हो सकता है जो सोचता है, समझता है, मनन करता है, ऐसे मननशील पुरुष के लिए योग के प्राप्ति में ये ज़रूरी है कि वो निष्काम भाव से कर्म करे, और जब वो योग के रास्ते पर चलने लग जाता है तब सबसे ज़रूरी होता है, सर्वसंकल्पों का आभाव, यानी कामनाओं का त्याग, आप में से कई को लग सकता है कि अगर कामना करना ही छोड़ दिया तोह जीवन में बचेगा क्या, परंतु सच्चाई ये है, की जब आप कामना करना छोड़ेंगे, तभी असली जीवन शुरू होगा, करके तोह देखिए, भगवान कृष्ण की बताई इस राह पे चलके तोह देखिए तोह – आप स्वयं ही समझ जाएंगे कि जीवन क्या है
  4. कृष्ण कहते हैं, की जिस समय में योगी न तोह इन्द्रियों के भोगों में अपना मन लगाता है, और ना ही कर्मों में ही आसत्त होता है, उस समय में जब वो अपनी सारी कामनाओं का त्याग कर देता है, तभी योगी होने की असली अवस्था में पहुंचता है, सबसे पहले आती है सोच, सोच के बाद सोचे हुए पर चलना, आजर सोचे हुए पे चलने के बाद उस रास्ते से भटकना नहीं, आर फिर आखिर में लक्ष्य को प्राप्त करना – पूर्ण योगी बनाने के पूरे रास्ते को कृष्ण ने अर्जुन को समझाया है
  5. हम अपने ही सबसे बड़े मित्र हैं और अपने ही सबसे बड़े दुश्मन, अगर आपको लगता है कि आपके दोस्त या रिश्तेदार आपका भला या बुरा कर सकते हैं, तवह वो बिल्कुल गलत है, वओ दुनियादारी की बातों में आपको फायदा या नुकसान ज़रूर पहुंचा सकते हैं, लेकिन उन बातों का कोई अर्थ नहीं है, आप स्वयं ही अपने आप को इस दुनिया से ऊपर उठाकर ज्ञान हासिल करने की कोशिश कर सकते हैं – आपको खुदको ही कर्मों के बंधन में से छूटने की कोशिश करनी होगी, क्योंकि मरते भी आप हैं और जीते भी आप हैं, अउर अपनी कोशिश से भगवान को भी हासिल आप ही करेंगे
  6. इस श्लोक में कृष्ण बता रहे हैं कि हम में से कौन अपना खुद का दोस्त और कौन अपना खुद का शत्रु है – जिसने अपने मन और इन्द्रियों सहित अपने मन को जीता हुआ है, वो अपने आप का मित्र है, और जिसके द्वारा मन तथा इन्द्रियों सहित शरीर नहीं जीता गया है, वो अपना शत्रु है, जो भावनाओं के आवेग में नहीं बहता, और खुद पर नियंत्रण रखता है, वो अपना भाल करता है, लेकिन जो काम या क्रोध में उल्टा, सीधा कर जाता है, वो अपना कितना बड़ा नुकसान करता है, ये आप समझ सकते हैं, फैसला आपके अपने हाथ में है
  7. सर्दी में या गर्मी में, सुख हो या दुख हो, जो एक जैसा ही रहता हो, शांत, मान हो या अपमान हो, जो दोनों में एक भाव से रहता हो, ऐसे पुरुष को कृष्ण स्वाधीन कहते हैं, मतलब की independent, ऐसे स्वाधीन पुरुष में ही सच्चा ज्ञान हो सकता है, अगर बाहरी चीज़ें decide करती हैं कि हमारा बर्ताव कैसा होगा तोह हम dependent हो गए, हमारी स्वाधीनता बंधी हुई है, बाहर की चीज़ों में, जब हम अपने आप पर नियंत्रण पा लेते हैं, तवह सब कुछ हमारे अंदर होता है, वो सच्ची आज़ादी है, परंतु हममें से ज़्यादातर लोग गुलाम हैं, बस फर्क इतना ही है कि वो जानते नहीं
  8. जिसके अंदर ज्ञान और विज्ञान भरा हुआ है, जो किसी कमी को अपने पर हावी नहीं होने देता, जिसकी अपनी इन्द्रियाँ अच्छे से जीती हुई हैं, और जिसके लिए, मिट्टी, पत्थर और सोना एक समान है, वह योगी युक्त अर्थात भगवत प्राप्त है, असली योगी मिट्टी और सोने को एक जैसा समझता है, लेकिन सोना तोह बहुमूल्य होता है, तोह सोने को मिट्टी समझना क्या नादानी नहीं है? जी नहीं, सोना बहुमूल्य है लेकिन इस दुनिया के सुखों के लिए वो सुख जो असल में झूठे हैं, योगी पुरुष इस बात को जान जाता है
  9. योगी की परिभाषा को समझाते हुए कृष्ण कहते हैं – जो सुरिध है – मतलब जो मन से सबका भला चाहता है, जो सबका दोस्त है, जो अपने दुश्मन से, अपने बुरा चाहने वाले का भी अच्छा चाहता है, वही असली योगी है, अच्छे बुरे लोगों में भेद करना हम सबकी आदत होती है, लेकिन क्या सब लोगों को judge कर पाने में आप सक्षम हैं? नहीं – जो योगी होता है ना वो किसीको judge नहीं करता, वो सबके लिए एक जैसा भाव रखता है, साधु को अच्छा कहना और चोर को बुरा कहना तोह आम बात है, वो तोह हम सब करते हैं, लेकिन योगी ऐसा नहीं करता
  10. जो अपने मन और इन्द्रियों के साथ शरीर को वश में रखता है, जिसने अपने मन में आशा को खत्म कर दिया है, और जो कुछ भी संग्रह यानी इकट्ठा नहीं करता, वही योगी है, उसे अकेले ही एकांत स्थान में स्थित होकर, आत्मा को निरंतर परमात्मा में लगाना चाहिए, जमा करना हम सब की आदत है, जिस तरह से जितना पैसा हम जमा करते हैं ना उसी तरह से अज्ञान और पाप भी जमा होता है, जिसका के हिसाब एक दिन तोह देना ही होता है – योगी समझदार होता है, वओ दुनिया से दूर होकर अकेले में भगवान को याद करता है
  11. इस शलोक में कृष्ण ध्यान में कैसे बैठें, उसका तरीका बता रहे हैं, साफ सुथरी भूमि पर घास का आसन, या मृगछाल या वस्त्रों से बना आसान होना चाहिए, ये आसान न तोह बोहोत ऊंचा हो और न ही बोहोत नीचे, महाभारत के समय से आज के ज़माने में बोहोत बदलाव आया है, घर अब वैसे नहीं होते जैसे पहले होते थे, लेकिन meditation का तरीका तोह नहीं बदला ना, और न ही कभी बदल सकता है, आसान और साधारण होना चाहिए, जगह साफ होनी चाहिए, साथ में आसन ऐसा न हो जो ऊंचा नीचा या हिल रहा हो, अर्थात स्थिर होना चाहिए
  12. साफ ज़मीन पर एक समतल आसान पर बैठ के आप ध्यान कर सकते हैं, ध्यान चाहे ईश्वर का कीजिये या अपने हृदय का, इरादा होना चाहिए कि बाहर की सारी disturbances से आप बच के खुद के अंदर झांके – कृष्ण कहते हैं कि आसान पर बैठ कर चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए, मन को एकाग्र करके अंतःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करें, मन को एकाग्र चित्त करके और हमारा मन जो हमेशा इधर उधर भागता है, उसे नियंत्रण में रखना है
  13. ध्यान में कैसे बैठें, medetation कैसे करें, इसी को समझा रहे हैं कृष्ण, वो कहते हैं कि अपने शरीर, सिर और गले को समान एवं अचल धारण करके और स्थिर होकर, आपनई नाक के आगे के हिस्से पर दृष्टि जमा कर, आया दिशाओं को ना देखते हुए, बैठन है, अउर बैठे हुए आपका सिर, गाला और शरीर का बाकी हिस्सा एकदम सीधा होना चाहिए, शरीर के स्थिरता के बाद मन को स्थिर करने के लिए आंखें नाक के आगे वाले हिस्से पर रखें ताकि अजर कुछ दिखाई ना दे, ऐसा करके डालने में को आप नियंत्रित कर सकते हैं, ध्यान कर सकते हैं
  14. कृष्ण ध्यान की अवस्था को आवे बताते हुए कहते हैं, कि साधक को ब्रम्हचारी के व्रत में स्थित होना चाहिए – ब्रम्हचारी से यहां मतलब है ब्रम्ह में आचार करने वाला, नियम से यज्ञ करने वाला, मन में कोई भी भय नहीं होना चाहिए, अंतःकरण एकदम शांत होने चाहिए, ऐसा सावधान योगी मन को रोककर मुझमें अपना चित्त लगाए, behaviour सात्विक होना चाहिए, किसी बात का डर न हो और मन में एकदम शांति, यही है योगी की अवस्था
  15. योगी कि ध्यान की अवस्था को और समझाते हुए कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, हे अर्जुन जिसने अपने मन को वश में कर लिया है, ऐसे योगी को अपनी आत्मा में मेरे स्वरूप को ढूंढना चाहिए, ऐसा करने वाला योगी मुझमें रहे वाले परमानंद की पराकाष्ठा रूप शांति को प्राप्त होता है – हमारी आत्मा उसी परमात्मा का ही एक अंश है, मन इस सच को हमसे छुपाने की कोशिश करता है, इसीलिए मैं को वश में करना एक योगी के लिए बेहद ज़रूरी है, तअभी ध्यान पूरा होगा, साधना पूरी होगी
  16. योग करते तोह बोहोत हैं, लेकिन कितनों को इसमें सिद्धि मिलती है और कौन हैं वो जिनको ये सिद्धि प्राप्त होती है, याही बात कृष्ण बताते हैं, हे अर्जुन, ये योग न तोह बोहोत खाने वाले का, नआ एकदम खाने वाले को मिलता है, न बोहोत ज़्यादा सोने वाले को, न हमेशा जागने वाले को भी – कृष्ण यहां अति की बात कर रहे हैं, चाहे भूख हो या नींद, अति किसी भी वस्तु की अछि नहीं है, बेशक़ वो अधिक की हो या काम की, जितनी आवश्यकता हो उतना ही खाइये, उतना ही सोइये और तभी योग संभव होगा
  17. योग उनके लिए आसान है जो सही आचरण पर चल सकें, जिनके लखे अनुशासन में चलना मुश्किल है, उनके लिए योग भी मुश्किल होगा, कृष्ण कहते हैं, की योग तोह उसी का सिद्ध होता है जो ठीक से खाता है, ठीक से सोता है और अपने कर्मों में अपनी पूरी निष्ठा रखता है, ऐसे ही साधक का योग पूरा होता है, और उसके सारे दुख कट जाते हैं, किसी भी activity को आप लीजिए, अगर उस activity को आपको करना है तो discipline तोह दिखाना ही पड़ेगा दोस्तों
  18. जिसने अपने चित्त को एकदम वश में कर लिया है और जो परमात्मा में ही भली भांति स्थित हो जाता है, ऐसे समय में वो साधक भोगों से दूर होकर योग युक्त हो जाता है, medetation में एक समय ऐसा आता है जब आपका मन पूरी तरह से आपके वश में होता है, उसकी हिम्मत नहीं इधर उधर का सोचने की, जब ऐसी स्तिथि आती है, तब आप अपने आप को अपने काम को परमात्मा में पूरी तरह से लगा सकते हैं, ऐसे समय में आप इन्द्रियों के भोगों से भी एकदम डोर हो जाते हैं, अउर यही पूर्ण योग की स्तिथि होती है
  19. योगी का मन, उसका चित्त कैसा होता है, इस श्लोक में उसकी बात की गई है, जिस प्रकार वायु रहित स्थान में स्थित दीपक जलाए मान नहीं होता, जब हवा नहीं होती तब दीपक की लौ सीधे उप्पर की ओर जाती है, इधर उधर नहीं भागती, उसी तरह, योगी का चित्त भी होता है, अपनी साधना में वो ऐसे रमा होता है, के उसका ध्यान कभी विचलित नहीं होता, concentration इसी को तोह कहते हैं, किसी काम में ऐसे लग जाना के होश ही न रहे
  20. योगी के लगातार अभ्यास से चित्त ऐसी अवस्था में पहुंच सकता है, जहां से वो विचलित नहीं होता, ऐसी विश्राम की स्तिथि में जब चित्त पहुंचता है तब हमारी सूक्ष्म बुद्धि, हमारा Intellect परमात्मा से साक्षात्कार कर सकता है, इसी में योगी को सच्ची संतुष्टि मिलती है, हमेशा उसका मन यही चाहता है के उसका ध्यान हर पल परमात्मा में ही लगा रहे – शूरी शुरू में अगर आपका मन वश में नहीं होता तोह घबराइए मत, लगातार ध्यान का अभ्यास करते रहिए और एक दिन ऐसा होगा कि ये जो मन है ना, ये एक दिन आपके control में आ जाएगा और उसके बाद योग को करना आसान हो जाएगा
  21. कुछ सुख तोह होते हैं जो इन्द्रियों के भोग से आते हैं, अर्थात हमारी इस दुनिया के सुख और कुछ सुख होते हैं जिनके बारे में हम जानते ही नहीं, कृष्ण उन्ही के बारे में बता रहे हैं, ये सुख उस परमात्मा के साक्षात्कार से ही संभव होता है, और ये जो सुख है इसको हम अपने सूक्ष्म बुद्धि से ही ग्रहण कर सकते हैं, लेकिन तभी जब हम योगी की अवस्था में आ जाएं, जिन सुखों को हम जानते हैं वो तोह थोड़ी देर के ही होते हैं, असली सुख क्या है, ये हम में से कुछ लोग ही जानते हैं, इसीलिए अगर आप ये जानना चाहते हैं, तोह योग करना शुरू कर दीजिए, योग पहला कदम है उस परम आनंद को जानने का
  22. दुनिया में सबसे बड़ा लाभ क्या होता है? लाखों करोड़ों का profit? या इसी तरह का कोई worldly benefit? हम लाभ को इसी sense में समझते हैं, यही हमारी अज्ञानता और बेवकूफी है, कृष्ण कहते हैं कि सबसे बड़ा लाभ है परमात्मा की प्राप्ति, जिसको ये लाभ मिल जाता है ना उसको उसके बाद और किसी लाभ की आवश्यकता नहीं रहती, बड़े से बड़ा दुख भी उसका कुछ नहीं कर पाता, परंतु इस लाभ को पाने के लिए, योगी बनना पड़ता है, तभी इस तरह की प्राप्ति संभव है
  23. इस दुनिया को भवसागर इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस संसार में सिर्फ दुख है, और इस संसार से आप बचेंगे कैसे, कोशिश करिये ये जानने की, की आखिर उस संसार में है क्या, अउर यही बात कृष्ण समझा रहे हैं अर्जुन को, के जो इस दुनिया के दुख से अलग है वही योग है, इसके ही हमको जानना चाहिए, और जानने के बाद इस योग को हमको सच्चे मन से करने का अभ्यास करना चाहिए, practice ही आपको योग में perfect बनाएगी, दुनिया में योग ही एक ऐसा रास्ता है जो भगवान के सच्चाई के बारे में बताएगा
  24. किसी वस्तु का मिल जाना होता है सैंयोग, किसी वस्तु का छूट जाना होता है वियोग, साइयोग और वियोग से जो परे है वो है वियोग, सबसे बड़े सुख की प्राप्ति का नाम है योग, इस दुनिया की इच्छाओं को छोड़कर ही इस योग की स्तिथि में आया जा सकता है, याउर इच्छाएं तभी छूटती हैं जब मन वश में होता है, इसलिए अगर योग की स्तिथि में आना है तोह लालच, स्वार्थ, दुनिया के छोटे मोटे फायदे, रिश्तेदारी, मोह, सब कुछ छोड़ना पड़ता है, फैसला हमारे हाथ में है कि हमे छोटा फायदा चाहिए या सबसे बड़ा फायदा
  25. पानी की अपनी कोई पहचान नहीं होती, जीस भी बर्तन में डालिये पानी उसके जैसा ही बन जाता है, लेकिन यही पानी जब लगातार किसी चट्टान में गिरता रहता है तोह अपना असर छोड़ जाता है, इसी को कृष्ण क्रम क्रम अभ्यास बात रहे हैं, धीरे धीरे अपनी practice करते रहिए और योग की स्तिथि को पाने के लिए हर रोज़ ध्यान करते रहिए, medetation में बैठते रहिए, कुछ समय बाद आपको खुद इसके फायदे दिखना शुरू हो जाएगा, है बात योग ही नहीं जीवन के हर पहलू पर लागू होती है
  26. आप जो करना चाहते हैं, मन उसमें कभी नहीं लगता और जो नहीं करना चाहते मन बार बार उसी तरफ भागता है, इसीलिए तोह मन को चंचल कहते हैं, ये कभी रुकता नहीं, परंतु लगातार अभ्यास से इसकी इसी आदत पे आप विजय पा सकते हैं, दुनिया की अलग अलग बातें इसको भगाती हैं, अस्थिर बनाती हैं, आपके अपने संकल्प, अपनी इच्छाशक्ति को दृढ़ करके ध्यान करते हुए इसी मन को वश में करना है, तभी ये मन परमात्मा या जो काम आप करना चाहते हैं उसमें ही लगा रहेगा
  27. गति चाहे धीमी ही क्यों न हो, लेकिन लगातार अभ्यास के बाद आप पाएंगे के आप अपने मन को वश में कर सकते हैं, एक बार ऐसा हो गया तोह आपका मन शांत हो जाएगा, उसकी चंचलता खत्म हो जाएगी, ये अवस्था ही पहली कड़ी है उस श्रृंखला की, जो आपको एक दिन परम आनंद के पास ले जाएगी, लरमात्मा के अगर दर्शन करने हैं, सबसे बड़े सुख को अगर feel करना है, तवह शुरुआत यहीं से करनी होगी, medetation को आप gateway मान सकते हैं सबसे बड़े सच का
  28. जो लगातार खुद को ध्यान में लगाकर, अपने मन को वश में करके योगी की स्तिथि में आता है, वो सारे पापों से भी दूर हो जाता है , वही योगी परब्रम्ह परमात्मा के रूप को जान पाता है, यही तोह सबसे बड़ा आनंद है, किसी को सोने में, किसी को खाने में, और भी न जाने कितने अनगिनत काम हैं जिससे लोगों को आनंद मिलता है, लेकिन ये सारे आनंद क्षणिक हैं, कुछ moments में खत्म हो जाने वाले, ब्रम्ह के स्वरूप को पहचानने का जो आनंद है वो सदा सदा के लिए है, वो ऐसा सुख है जो कभी खत्म नहीं होता
  29. हमारे चारों तरफ एक अनंत चेतना है, infinite consciousness, इसी में हमको एक भाव से अपना मन लगाना होता है, जो योगी ऐसा करने में सक्षम हो जाता है, जो सबको समभाव से देखता है, वो अपनी आत्मा को जान जाता है, हमारी आत्मा में सब कुछ है लेकिन उसे देखने के लिए ज्ञान चाहिए होता है, और ये ज्ञान योग से ही आता है, consciousness की सबसे बड़ी स्तिथि को ही योग कहते हैं, और तभी हम अपने आप को पूरी दुनिया में और पूरी दुनिया को अपने आप में देख पाते हैं
  30. 5:01:45

Leave a Reply